कोटे वाली माता मंदिर

हिमाचल प्रदेश में देवी-देवताओं का वास होने के कारण हिमाचल को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश में कई धार्मिक स्थल हैं, जिनके दर्शनार्थ दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल कोटे वाली माता मंदिर राजा का तालाब से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर पंचायत गुरियाल के कोटे वाले जंगल में स्थित है। राजा का तालाब में मां कोटे वाली माता का विशालकाय गेट बना हुआ है। कोटे वाली माता मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। कथानुसार 12वीं शताब्दी में दिल्ली के शासक आनंद पाल तोमर ने दिल्ली का सिंहासन अपने दोहते पृथ्वी राज चौहान को सौंपा। इस कारण आनंद पाल तोमर के संबंधियों ने विद्रोह शुरू कर दिया। चारों तरफ  से विरोधियों से घिर चुके पृथ्वी राज चौहान ने हिम्मत नहीं हारी और विद्रोह को कुचल कर रख दिया। विद्रोही जान बचाकर उत्तर की तरफ  सुरक्षित स्थान को भाग निकले। कोटा से पृथ्वी राज चौहान के संबंधी भागकर उत्तर में शिवालिक की पहाडि़यों में छिपने हेतु भागते समय अपनी कुलदेवी को भी साथ ही ले आए तथा कोटे वाले जंगल में स्थापित कर दिया। अब इसको कोटे वाली माता के नाम से जाना जाता है।  दंत कथानुसार कहा जाता है कि गुरियाल गांव के दंपति के घर कोई ओलाद नहीं थी। दंपति ने मां कोटे वाली के दरवार में जाकर मन्नत मांगी तथा मन्नत मांगने पर दंपति के घर में कन्या पैदा हुई।  कन्या दिनोंदिन बड़ी होती गई तथा परिवार मां के दर शीश झुकाना भूल गया। एक दिन लड़की अचानक से कहीं गुम हो गई। परिजनों ने उसको काफी तलाशा, लेकिन कहीं कोई पता नहीं चला। आखिरकार उनको माता की याद आई तथा दंपति दौड़े-दौड़े मां के दरबार में पहुंच गए। उन्होंने मां से क्षमा याचना की तथा रोते बिलखते गिड़गिड़ाने लगे। मां की कृपा से लड़की मां के दरबार के पीछे से निकल आई। दंपति खुश हुआ। दंपति ने लड़की से पूछा कि आप कहां गई थी, तो लड़की ने कहा कि मैं अपनी अम्मा से मिलने आई थी। अम्मा ने मुझे हलवा-पुरी खिलाई।

इसके बाद मां की जय-जय कार होने लगी तथा माता की ख्याति दूर-दूर तक होने लगी। वर्ष 1971 से इस मंदिर के रखरखाव का जिम्मा गुरियाल गांव की मंदिर कमेटी के हाथ में है। इस मंदिर में हिमाचल के अलावा बाहरी राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं तथा मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर मंदिर में सुखन देने के लिए आते हैं। पहले मंदिर में बकरों की बलि दी जाती थी, लेकिन बलि प्रथा पर प्रतिबंध लगने के उपरांत अब इस प्रथा को मंदिर में बंद कर दिया गया है। अब मंदिर में मात्र मीठा प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। राजा का तालाब से कोटे वाली माता मंदिर को जाने वाले मार्ग पर रेलवे फाटक पड़ता है तथा रेलवे विभाग द्वारा मार्ग के दोनों तरफ  लोहे के एंगल लगाकर मार्ग को बंद कर दिया गया है, जिस कारण मंदिर तक श्रद्धालुओं के चौपहिया वाहन नहीं पहुंच पाते हैं। श्रद्धालुओं की मांग है कि रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज बनाया जाए ताकि चौपहिया वाहन मंदिर तक पहुंच सकें।

– सुनील दत्त, जवाली

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