गरीबों की पहुंच से दूर नौणी विश्वविद्यालय

तसोलन —सरकारी क्षेत्र में हुई भारी भरकम फीस ने विद्यार्थियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। किसान परिवारों व आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए नौणी विश्वविद्यालय में अध्ययन करना अब किले को फतह करने जैसा हो गया है। डा. वाईएस परमार ओद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय एशिया का प्रथम विश्वविद्यालय है तथा यह 1985 में अस्तित्व में आया था। सरकारी क्षेत्र में स्थापित इस विवि में प्रदेश के साथ-साथ बाहरी राज्यों के विद्यार्थियों को प्रवेश परीक्षा में मैरिट के आधार पर दाखिला दिया जाता है। वानिकी व बागबानी विषय में बहुत कम फीस होने के कारण गरीब बच्चों के लिए यहां अध्ययन करना वरदान समझा जाता था। बीते तीन वर्षों में इन विषयों में इतनी अधिक फीस बढ़ा दी गई है, जिससे आर्थिक रूप से पिछड़े व किसानों-बागबानों के परिवार के विद्यार्थियों की कमर टूट गई है। कुछ वर्ष पूर्व तक बागबानी व वानिकी विषय में बीएससी प्रथम वर्ष के एक सेमेस्टर की फीस जहां 18000 रुपए के करीब थी लेकिन, अब शनैः शनैः तीन वर्षों में इस फीस को चार गुना के करीब 68 हजार रुपए कर दिया गया है। यहां पर अध्ययन करने के लिए अब एक विद्यार्थी को प्रतिवर्ष डेढ़ से दो लाख रुपए की भारी भरकम फीस अदा करनी पड़ रही है। देश में सरकारी क्षेत्र में संचालित किसी भी कोर्स की इतनी अधिक फीस नहीं है तथा नौणी विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले में निजी संस्थानों को भी पछाड़ दिया है। विचारणीय विषय यह भी है कि देश में सरकारी क्षेत्र में संचालित किसी भी कृषि विश्वविद्यालय में प्रति सेमेस्टर फीस 5000 से लेकर 8000 रुपए ही वसूली जाती है। नौणी विवि ने राष्ट्रीय मानकों को दरकिनार करते हुए इस फीस को करीब दस गुना बढ़ा दिया है। यदि भोजन व आवासीय सुविधा का अवलोकन करें तो एक वर्ष में प्रत्येक छात्र को दो लाख रुपए से भी अधिक रकम चुकानी पड़ रही है। इस फीस बढ़ोतरी का फंड विवि प्रशासन कहां इस्तेमाल कर रहा है, इस बात को लेकर भी विश्वविद्यालय परिसर में चर्चाएं हैं।

गाइडलाइन के मुताबिक

यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की गाइडलाइन में भी सरकारी कृषि व बागबानी विश्वविद्यालय में फीस बहुत ही कम लेना वर्णित है, क्योंकि यह विवि विद्यार्थियों व किसान परिवारों के कल्याण के लिए स्थापित है।

You might also like