गीता रहस्य

स्वामी रामस्वरूप

मनुष्य योनि का प्रयोजन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की सिद्धि है, जिसे पाकर जीव सदा आनंदमय, निरोग आयु प्राप्त करता है। पंरतु अज्ञानी पुरुष की तो आशा अर्थहीन है अर्थात वह सदा काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार , धन, संपत्ति अर्थात केवल संसारी वस्तुओं की ही आशा करता रहता है और केवल ऐसी आशा मनुष्य देह का अर्थ (प्रयोजन) जोकि मोक्ष है उससे दूर कर देती है…

जब जीव बड़ा होकर ऊपर के गुणों में लिप्त होकर पाप कर्म करता है तब उसे असुर कहते हैं और जब जीव धीरे-धीरे विद्वानों का संग करता हुआ वेद विद्या एवं योग विद्या आदि ग्रहण करके वेदानुकूल पुण्यवान कर्म करता है तब वह देवयोनि में आता है और उस नर अथवा नारी को देवता / देवी कहते हैं। इस प्रकार जीव की यह तीन योनियां होती है। श्लोक 9/15 में ‘विचेतस’ अर्थात अज्ञानी और राक्षसीम अर्थात राक्षसों और ‘आसुरीम’ अर्थात असुरों के स्वभाव वाले यही पुरुष हैं जो प्रकृति के तीन गुणों में लिप्त हुए पाप करते हैं और ईश्वर को भूले हुए हैं। ‘मोघाशा’ अर्थात ऐसे पुरुष अर्थहीन आशा वाले हैं। अर्थ का अभिप्राय शुभ फल अथवा मनुष्य योनि का प्रयोजन है। मनुष्य योनि का प्रयोजन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की सिद्धि है, जिसे पाकर जीव सदा आनंदमय, निरोग आयु प्राप्त करता है। पंरतु अज्ञानी पुरुष की तो आशा अर्थहीन है अर्थात वह सदा काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार , धन, संपत्ति अर्थात केवल संसारी वस्तुओं की ही आशा करता रहता है और केवल ऐसी आशा मनुष्य देह का अर्थ (प्रयोजन) जोकि मोक्ष है उससे दूर कर देती है। यही अर्थ ‘ मोघकर्माणः’ अर्थात अर्थहीन कर्म के विषय में है कि अज्ञानीजन जो वेद विरुद्ध पाप कर्म में लिप्त रहते है उनके जितने भी कर्म है वह पापयुक्त होते हुए मानव शरीर प्राप्त करने के ध्येय से भटका देते हैं, दूर कर देते हैं। ऐसे ही राक्षस स्वभाव वाले मोहिनी प्रकृति के होते हैं अर्थात यह संसार की चमक दमक की ओर आकर्षित होते हैं और स्वयं को सजा-धजा कर अपनी बातों में दूसरों को आकर्षित करते हैं और इस प्रकार मोह ममता में फंसे घोर दुःखों को प्राप्त होते हैं।  अब प्रश्न यह है कि ऐसे पुरुष क्यों पापयुक्त कर्म करते हैं और क्यों श्लोक 9/12 में लिखे अवगुणों से युक्त होकर आसुरी स्वभाव वाले होते है ? इस प्रयन का उत्तर स्थान-स्थान पर चारों वेदों ने दिया है। जैसे ऋग्वेद मंत्र 10/125/4 में कहा है।    

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