चेतना की गुणवत्ता

श्रीश्री रवि शंकर

भगवद्गीता में एक कहानी है। जब भगवान कृष्ण को भोजन परोसा जा रहा था, वे खड़े हुए और बोले, नहीं मुझे जाना है। गोपियों ने उन्हें समझाने की कोशिश की। पहले अपना भोजन तो कर लो उन्होंने विनती की, लेकिन वह बोले नहीं, मेरा एक भक्त मुश्किल में है और मुझे पुकार रहा है। मुझे उसके लिए जाना होगा। ऐसा कह कर वह तेजी से दौड़ पड़े, लेकिन दरवाजे से ही वापस आ गए। क्या हुआ? गोपियों ने पूछा। कृष्ण ने जवाब दिया, पहले तो उसने सोचा कि मैं ही एक सहायक हूं और मुझे पुकारने लगा, लेकिन बाद में उसने सोचा कि कुछ और भी हैं जो उसकी मदद कर सकते हैं। इसलिए मैं इंतजार कर सकता हूं। यह कहानी बताती है प्रार्थना की तीव्रता के बारे में। एक प्रार्थना का जन्म तब होता है जब आप पूर्णरूप से निसहाय अनुभव करते हो या पूर्ण रुप से कृतज्ञ हो। तीसरे तरह की प्रार्थना भी होती है जब आप पूर्ण विवेक में हो। तब आपको यह पता चलता है कि चेतना की गुणवत्ता अपनी सभी सीमाओं के परे चली गई है और बहुत ऊपर उठ गई है, उसकी दिशा पूर्णरूप से बदल गई है जो कि पूर्णता देने वाली है, संपूर्ण ज्ञान से भरपूर है और पूरे विवेक और प्रेम से ओत-प्रोत हैं। प्रायः लोग कहते हैं, हृदय से प्रार्थना करो। इससे काम नहीं चलने वाला जब आप बैचेनी में हो इच्छा से भरे हुए हो और बिखरे हुए हो। आपको अपने अस्तित्व से प्रार्थना करनी होगी। दूसरे चक्र से, जब पूर्ण कृतज्ञ हो तब आप हृदय से प्रार्थना करो, लेकिन जब आप दयनीयता की स्थिति में हो तब आप हृदय से प्रार्थना नहीं कर सकते। एक बार जब आप यह कहते हो ठीक है, मैंने सब कुछ छोड़ दिया, तब आपकी प्रार्थना की तीव्रता पूर्ण हो जाती है। इसी तरह से इच्छा के ज्वर से बाहर निकला जा सकता है। आप अपने अस्तित्व से प्रार्थना करें। ये ही आपको सशक्त बनाती है, क्योंकि दिव्यता कमजोर के लिए बनी है। इसीलिए उसे दीनबंधु कहते हैं। दीन का अर्थ है कमजोर, दयनीय, शक्तिहीन और निसहाय और बंधु का अर्थ है मित्र। इसीलिए आप प्रार्थना करते हैं। अब मेरे पास कोई रास्ता नही है और मैं तनाव छोड़ देता हूं। मुझे सहायता की आवश्यकता है। तभी आपके चारों ओर परिवर्तन होने लगते हैं। प्रायः लोग पूछते हैं, हम इतने सारे देवी-देवताओं से प्रार्थना क्यों करते हैं? दिव्यता एक ही है, लेकिन अनेक नामों से पुकारा जाता है।  ईश्वर सबके हृदय में है, सब जगह है, आपके चारों ओर है और आप में भी है। वह जानता है कि आपके लिए सबसे उत्तम क्या है और आपको जो सबसे अच्छा लगता है वही आपको देता है। प्रार्थना का अर्थ है दिल की गहराइयों से पुकारना। प्रार्थना की उच्च अवस्था ही ध्यान है। प्रार्थना का अर्थ है मांगना, ध्यान का अर्थ है सुनना। प्रार्थना में आप कहते हैं, मुझे ये दो, वो दो। निर्देश देते हो, मांग करते हो। ध्यान में आप कहते हैं, मै यहां पर हूं सुनने के लिए जो कुछ भी आप बताना चाहते हैं मुझे बताएं। जब प्रार्थना अपने शिखर की ओर जाती है तब वह ध्यान हो जाता है। मौन प्रार्थना से बेहतर है।  प्रार्थना शब्द शक्ति है, जो आपके हृदय को मौन की ओर ले जाती है। प्रार्थना में भाव का होना जरूरी है।

 

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