जनजातीय मेले में सजे स्टोन पाउडर से बने बर्तन

शिमला—शिमला के खेलकूद परिसर में जनजातीय मेले में मणिपुर की अतुन मांगते द्वारा स्टोन पाउडर के बर्तनों की प्रदर्शनी लगाई गई है। पत्थर की मिट्टी से बने ये बर्तन बहुत ही सस्ते दाम पर बेचे जा रहे हैं।  इन बर्तनों में  चाय कॉफी और अन्य प्रकार के सेट रखे गए हैं। मेले के दौरान इन्हें देखने और खरीदने में काफी लोगों की भीड़ लग रही है। हजारों वर्षों से समाज में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता आया है। अभी कुछ वर्षो पूर्व तक गॉंवों में वैवाहिक कार्यक्रमों में तो मिट्टी के बर्तन ही उपयोग में आते थे। घरों में दाल पकाने,दूध गर्म करने, दही जमाने, चावल बनाने और अचार रखने के लिए   मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता  रहा है। लेकिन आज के दौर में समाज में पुरानी पारम्मारिक सभ्यता और तौर तरिकों को तो मानों भूल सा ही गया है। लेकिन खेल परिसर में लगे जनजातीय मेले में मणिपुर से आई एक महिला ने इस पुरानी कला को जीवत रखा है। वहीं इन दिनों उनके द्वारा बनाए गए बर्तनों की लोगों द्वारा खूब खरीददारी की जा रही है। लोगों द्वारा सबसे ज्यादा टी कप और काफी कप खरीद रहें है। बता दे कि इन बर्तनों में खाना खाने से रक्तचाप, शुगर, सांस की दिक्कत और अन्य प्रकार की बिमारीयां भी ठीक होती हैं। यह बर्तन प्राकृतिक पत्थरों के पाउडर से तैयार किया गया है और इन बर्तनों कोे बनाने में किसी भी प्रकार के रसायनों और मश्निरी का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह बर्तन बहुत ही सस्ते दाम पर भी बेचे जा रहे है। अतुन मांगते ने बताया कि पत्थर से बने बर्तन मणिपुर की पुरानी धरोहर है यह लुप्त होती जा रही है। यहां पर पत्थर के पाउडर के चाय के प्याले, केतलियां, कॉफी कप, वीयर कप, कटोरी, प्लेट और अन्य प्रकार के रसोई के बर्तन बेचने के लिए लाए गए है। इन बर्तनों को माईक्रोवे में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऐसे बनाए जाते हैं बर्तन

मणिपुर में काले पत्थर की एक खान है जहां से लोग इन्हें लाते हैं और अपने घर में पीसते हंै इसकी मिट्टी को संजो कर इसको पानी के साथ एक लेप बनाया जाता है। उसके बाद इससे बर्तन का आकार दिया जाता है। बर्तन के आकार देने के बाद इसे पूरा दिन के लिए धूप में सुखाया जाता है और इसकी अशुद्घि दूर करने के लिए इससे आग के बीच सेका जाता है और ठंडा होने के लिए खुले में रखा जाता है। इन बर्तनों केा बनाने के लिए करीब दो से तीन दिन का समय लगता है।

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