जनमंचों के सबक से दूर कर्मचारी

Jun 1st, 2019 12:05 am

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

 

तहसीलों में अकसर लोगों की भीड़ देखने को मिलती है। आखिर क्या वजह है कि बारह महीने ऐसा ही आलम रहता है। इस विभाग के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली भी बिलकुल निराली लगती है। ऐसा आभास होता है कि जनता विभागों के लिए है, न कि विभाग जनता की सुख-सुविधाओं के लिए बनाए गए हैं। अफसोस  की बात यह है कि सरकारों ने कर्मचारियों को ड्यूटी का जिम्मा सौंपते समय उन्हें जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारियों से अवगत करवाना कभी मुनासिब नहीं समझा। हकीकत सबके सामने है कि कर्मचारी उल्टा जनता को ही आंखें दिखाकर उनके लिए सिरदर्द बने हुए हैं…

सरकारी कर्मचारियों की जनता के प्रति सही जवाबदेही ही सरकार की सकारात्मक पहचान करवाती है। अगर हिमाचल प्रदेश सरकारी विभागों के कुछेक कर्मचारियों की कार्यप्रणाली सही होती, तो शायद वर्तमान सरकार को तेरह जनमंचों का आयोजन करके करोड़ों रुपए खर्च भी न करने पड़ते। कर्जे में डूबी सरकार ने इसके बावजूद जनता के घर-द्वार पहुंचकर उनकी समस्याओं का शीघ्र निदान करने की सराहनीय पहल की है। जनमंचों के बावजूद सरकारी कर्मचारियों ने अपनी कार्यशैली में कोई सुधार करने की आवश्यकता महसूस नहीं की है। नतीजतन सरकार अब धीरे-धीरे सभी विभागों में बायोमीट्रिक मशीनें लगाकर कर्मचारियों की सेवाओं से संबंधित कार्यप्रणाली को परखने जा रही है। हिमाचल प्रदेश पहाड़ी राज्य होने की वजह से जहां दूरसंचार विभाग की कंपनियों का नेटवर्क ही अकसर हवा के झोंकों की तरह आता और जाता है। ऐसे में स्कूलों और अस्पतालों में लगाई जाने वाली बायोमीट्रिक मशीनें क्या सच में कर्मचारियों की सही उपस्थिति का डाटा ऑनलाइन सुरक्षित रख सकेंगी? बायोमीट्रिक मशीन लगाने की शुरुआत सबसे पहले स्कूलों से हो चुकी है और अब सरकारी अस्पतालों में भी लगाने की प्रक्रिया चल पड़ी है।

एक सरकारी और गैर सरकारी कर्मचारी की अपनी एक अलग पहचान ऐसी होनी चाहिए, जिसका जनता को लाभ मिले। कर्मचारी अनुशासन अनुसार वर्दी पहनकर ड्यूटी पर आएं, विभाग का पहचान पत्र पहनें और गले में टाई लगाकर पूरा दिन जनता के प्रति जवाबदेह रहें, ताकि सरकारों को जनमंच और शिकायत निवारण शिविरों का आयोजन ही न करना पड़े। प्रोफेशनल दिखने वाले कर्मचारी ही जनता की आशाओं पर बेहतर उतर सकते हैं। पहाड़ में स्थिति बिलकुल दिनोंदिन उलट बनती जा रही है, जिसका खामियाजा जनता को ही भुगतना  पड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सरकार लगातार जनता के प्रति समर्पित रहती आ रही है, मगर कुछेक कर्मचारियों में अकर्मण्यता की भावना पनपती जा रही है। पहाड़ में कार्यालयों में एक कर्मचारी और आम आदमी में कोई अंतर महसूस नहीं किया जा सकता है। सरकारी विभागों ने कभी अपने कर्मचारियों को अनुशासन में देखने के लिए उन्हें कंपलीट वर्दी में देखने की किसी ने जरूरत महसूस नहीं की है। आठ घंटे की ड्यूटी में एक सरकारी कर्मचारी जनता के प्रति कितना जवाबदेह है, इसकी परख सरकार को करनी होगी। एक दिन में ऐसे कर्मचारी जनता की कितनी समस्याओं का निपटारा समय पर कर रहे हैं, इसकी फीडबैक लेनी होगी। सच बात तो यह कि कर्मचारियों की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने की बजाय राजनीति में दिलचस्पी ज्यादा बढ़ रही है। राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले कर्मचारी अपने घरों के पास ही डेरा जमाए रखना चाहते हैं। शिक्षा विभाग ने इसके लिए नीति बनाने का प्रयास किया था, मगर वह भी सिरे नहीं चढ़ सकी। सरकारों ने आज दिन तक इस बारे में कोई ठोस नीति नहीं बनाई, जिसके चलते कर्मचारियों की कार्य प्रणाली में कोई सुधार मिल पाता। लोकसभा चुनाव के लिए हजारों अध्यापकों की प्रतिनियुक्ति की गई थी। ऐसे हालात में स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित भी हो सकती है, किसी ने सोचना गवारा नहीं समझा। आम आदमी का रहन-सहन सही न होने की वजह से ज्यादातर लोग बीमार होकर अस्पतालों की कतारों में खड़े देखने को मिल रहे हैं। ज्यादातर अस्पतालों में स्टाफ समय पर न आने की वजह से खामियाजा लोग भुगत रहे हैं। सरकारों ने कर्मचारियों के लिए जो ड्यूटी समय निर्धारित कर रखा है, आजकल उसके विपरीत काम करना सभी की आदत बन चुकी है। अगर चिकित्सक समय पर आएं, तो शायद उनके दरवाजों पर मरीजों की लंबी कतारें न मिलें। एक पर्ची बनाने के लिए ही मरीज को घंटों कतार में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में तैनात कुछेक चिकित्सकों ने अपने परिवार वालों के नाम पर निजी अस्पताल खोल रखे हैं। भगवान का दर्जा प्राप्त किए ऐसे मतलबपरस्त चिकित्सक वेतनमान तो सरकार से ले रहे हैं और मरीजों को अपने निजी अस्पतालों से इलाज करवाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

आखिर क्या वजह है कि सरकार का स्वास्थ्य विभाग अस्पतालों में मौजूद सुविधाओं को गिनाते नहीं थकता, मगर सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक अकसर मरीजों को निजी अस्पतालों में रैफर करने को अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते जा रहे हैं। सरकार को हर अस्पताल में ऐसे मरीजों का डाटा एकत्रित करके लापरवाह चिकित्सकों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। ठीक ऐसा ही आलम सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग का है। माना कि विभाग में स्टाफ की भारी कमी चल रही है, मगर कर्मचारी अपनी मनमर्जी से ड्यूटी पर आने की आदत बना चुके हैं। तहसीलों में अकसर लोगों की भीड़ देखने को मिलती है। आखिर क्या वजह है कि बारह महीने ऐसा ही आलम रहता है। इस विभाग के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली भी बिलकुल निराली लगती है।

ऐसा आभास होता है कि जनता विभागों के लिए है, न कि विभाग जनता की सुख-सुविधाओं के लिए बनाए गए हैं। अफसोस  की बात यह है कि सरकारों ने कर्मचारियों को ड्यूटी का जिम्मा सौंपते समय उन्हें जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारियों से अवगत करवाना कभी मुनासिब नहीं समझा। हकीकत सबके सामने है कि कर्मचारी उल्टा जनता को ही आंखें दिखाकर उनके लिए सिरदर्द बने हुए हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सरकार को किसी भी विभाग के कर्मचारी को ज्यादा देर तक खासकर अपने ही क्षेत्र में ड्यूटी करने वालों को दूसरी जगहों की सैर करवाने की आदत भी  डालनी चाहिए। सालों से एक ही जगह पर डटे हुए नेताओं की चमचागिरी करने वाले कर्मचारी जनता की अनदेखी करते हैं।

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