जनमंच की पलकों पर

जनमंच के कसीदों के बीच दो प्रतिक्रियाएं काफी अहमियत रखती हैं और समझने के लिए यह काफी है कि कोटली में मंत्री से विधायक की हैसियत में लौटे अनिल शर्मा के सामने हारती विरासत और मुखर होती सियासत है। इसी तरह किन्नौर की पलकें खोलने के बजाय विधायक जगत सिंह नेगी बनाम शहरी विकास मंत्री सरवीण चौधरी के बीच हुए संवाद में विवाद के मूंछें उग आई हैं। वैसे पूर्णता में सरकार ने अपने और जनता के फासलों के बीच पच्चीस सौ शिकायतों में सुशासन की पड़ताल जरूर की होगी। काफी हद तक मामले निपटे भी, लेकिन अधिकांश सामान्य प्रक्रिया में निपट सकते थे और इसके लिए हिमाचल सरकार ने गारंटी दे रखी है। देखना यह भी होगा कि जनमंच में कितना दरबार और कितना सरोकार हाजिरी लगाता है। बेशक निजी मसलों की फेहरिस्त में जनमंच अपनी भूमिका की छबील की तरह है और इसीलिए शासन-प्रशासन के प्यासे को कुछ बूंदे राहत की मिलती हैं। प्रतिज्ञा और पारदर्शिता के नमूनों में जीवंतता भरते जनमंच के सामने आखिर कितनी रूटीन और कितनी इच्छाशक्ति भर रही है, यह भी देखना होगा, क्योंकि क्षेत्रीय तौर पर मसलों का मंचन भी एक आदाब की तरह उसी भीड़ को इकट्ठा कर रहा है, जो प्रायः अपने आवेदनों की तह पर खड़ी रहती है। हमें नहीं मालूम कितने प्रश्नों ने गांव की मिट्टी चुनी या यह पूछा कि जीरो बजट खेती पर ये जनमंच कितना सार्थक बता पाते हैं। कमोबेश हर गांव के किसान को अदरक या धान के बीज की माकूल आपूर्ति तथा इसे उगाने की गारंटी तो नहीं मिली। पता नहीं किस जनमंच में कृषि व बागबानी के वैज्ञानिकों ने अपनी हाजिरी की छांव में किसान-बागबान का विश्वास पा लिया। क्या आईपीएच को अपने हिस्से की शाबाशी मिली या खेत की सूखी मिट्टी को सींचते इरादों का प्रमाणित जिक्र हुआ। हमारे वजूद के ताने-बाने में राज्य से केंद्र तक की कई योजनाएं-परियोजनाएं अपने तौर पर समृद्ध हैं, लेकिन जनमंच की मुनादी में इनका अर्थ अगर पेचीदा है, तो समाज को सियासी ग्राहक के बजाय उसकी जमीन और जमीर का अधिकार चाहिए। लगभग हर गांव के परिदृश्य में हम भारत देखते हैं और चुनावी सफलता के बाद नागरिक महत्त्वाकांक्षा का आकार देखते हैं, इसलिए लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद जनमंच की तासीर जरूर बदली है। सरकार इसके जरिए बहुत कुछ माप सकती है, लेकिन उस हालात से हम पीछे कैसे मुड़ेंगे जहां आधारभूत कोशिशें ही अभी शुरू नहीं हुईं। हर जनमंच अगर उन पत्थरों का हिसाब कर ले, जो कभी इसी तरह उम्मीदों के पालने में पैदा हुए, लेकिन शिलान्यास की कैद में आजीवन गुम से हैं। बेशक जनमंच आम आदमी से जुड़ता है, लेकिन वास्तविक अवलोकन तो कर्मचारी-अधिकारी के जुड़ने का है। जाहिर तौर पर कानून हैं और नियमों की कमी नहीं, लेकिन क्या आज की व्यवस्था इस हालत में है कि सरेआम हो रहे उल्लंघन को रोक सके। सरकार कुछ ऐसा भी तो कर सकती है कि हर बार अलग-अलग विषय पर जनमंच करके प्रदेश की दृष्टि बदले। पिछले पंद्रह दिनों में प्रदेश या तो नशे के कारण बदनाम या पर्यटक सीजन के भंवर में फंसा रहा। ऐसे में जनमंच अगर तात्कालिक सामूहिक प्रश्नों का उत्तर ढूंढते हुए समयावधि के भीतर राहत दे, तो निश्चित तौर पर प्रासंगिकता बढ़ेगी। इस समय तक पर्यटन की भीड़ छंट जानी चाहिए थी और नशे के खिलाफ पुलिस की वर्दी कड़क हो जानी चाहिए थी। जनता के मसले छोटे हैं, लेकिन राज्य स्तरीय पैमाने पर उनकी पैमाइश बढ़ जाती है। कम से कम हर बार एक राज्यव्यापी प्रश्न चिन्हित हो तथा इसी आधार पर मंत्रियों के कार्यों का विवेचन भी हो। किन्नौर की बहस में जनमंच से ऊपर सियासत दिखाई दी, तो यह जनता की नुमाइंदगी नहीं। क्या जनमंच का उद्देश्य गैरराजनीतिक ढंग से प्रशासनिक हल निकालना या सुशासन की पहल में न्याय देना नहीं। अगर ऐसा है, तो इसे साबित करने की आवश्यकता है।

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