जैव विविधता से संवरेगी प्रकृति

बचन सिंह घटवाल

लेखक, कांगड़ा से हैं

 

प्रगति के पहिए का चक्र समृद्धि का द्योतक माना जाता है, परंतु अपनी सुविधा के लिए हम कुछ भी कर गुजरने को तैयार नजर आते हैं। विषैली दवाइयां, कीटनाशक हर पल जैविक व्यवस्था को तहस-नहस करने का कार्य कर रहे हैं, परंतु मानव के आगे संसार के प्रत्येक जीव ने अपने घुटने टेक दिए हैं। वर्तमान संदर्भ में कई बातों से आमजन सहमत होंगे कि फसलों में अच्छे गुणों की फसल विकसित करने का चलन निरंतर जोर पकड़ता जा रहा है। उसके विस्तृत स्तर पर उपयोग के कारण स्थानीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं…

प्रकृति निर्माण धरा की एक अद्भुत प्रक्रिया रही है, जिसमें जीवन के अनेक अंग सृष्टि निर्माण के संग सृजित होते रहे हैं। वनस्पतियों से लेकर धरा के प्रत्येक जीवों की अनेक प्रजातियों का सृजन अद्भुत सांसारिक घटना है। समय संग जैविक प्रजातियों में परिवर्तन प्रक्रिया चलती रहती है, जिसमें प्रकृति के रंग-रूप में भांति-भांति के कीट पतंगे, पक्षियों की प्रजातियां समुद्री जीव व वनस्पति जगत में असंख्य प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और कुछ धीरे-धीरे गिरावट के स्तर छूती हुई सिमटने की कगार पर हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार हर चौबीस घंटे में लगभग 200 प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पर्यावरणीय परिवर्तनशीलता में मानवीय हस्तक्षेपों का बहुत बड़ा हाथ है, जिसके कारण शनैः-शनैः सभी प्रकार की प्रजातियों पर पड़ रहा प्रभाव उनके सिमटने की वजह बन रहा है। जैव विविधता से आशय जल, थल और वायु में विद्यमान जीवों, पादप व शैवालों के बीच पाई जाने वाली विभिन्नता है, जो कि प्रजातियों के बीच उनकी विविधता को प्रदर्शित करती है। यूं कहें तो जैव विविधता का मानव जीवन में शीर्ष स्थान है। जैव विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है।

संसार के विकासशील देशों में जैव विविधता के क्षरण के कारकों में अगर देखा जाए, तो अशिक्षा, जनसंख्या विस्फोट व वैज्ञानिक विकास का अभाव आदि ऐसे कारण हैं, जो देशों में जैव विविधता क्षरण के लिए जिम्मेदार हैं। दुनिया में कुल कितनी प्रजातियां हैं, यह ज्ञान से परे है, लेकिन अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका 2016 के एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 30 लाख से 10 करोड़ के बीच है। आज तक दुनिया में 14,35,662 प्रजातियों की पहचान की गई है। हालांकि बहुत सी प्रजातियों की पहचान होना अभी बाकी है। पहचानी गई प्रजातियों में 7,51,000 प्रजातियां कीटों, 2,48,000 पौधों, 2,81,000 जंतुओं, 68,000 कवकों, 26,000 शैवालों, 4800 जीवाणुओं तथा 1000 विषाणुओं की हैं। प्राकृतिक छेड़छाड़ व पर्यावरणीय क्षय के कारण असंख्य प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं। इसमें संदेह नहीं है कि प्राकृतिक छेड़छाड़ में मानव का सबसे बड़ा हाथ है। हम देखते हैं कि जाने-अनजाने मानव जैविक क्रियाओं में कितने ही जीवों, वनस्पतियों के संहार का जिम्मेदार है। प्रकृति परिवर्तन में जहां प्रकृति स्वयं विध्वंस का कारण बनती है, तो मानव वनों में आगजनी की घटनाओं से जैव क्रियाओं के क्षय का कारण बनता हुआ दिखाई देता है। वहीं जलीय जीवों के अथाह भंडार को भी  नदियों, झीलों व सागरों में हस्तक्षेप व दूषित कर जाने-अनजाने अनेक जीव व वनस्पतियों के विनाश का कारक बन रहे हैं। पक्षियों की प्रजातियों को भी समय चक्र लीलता जा रहा है। हमारे घरों में फुदकती गौरेया को विनाशक समय की मार झेलनी पड़ी है। वहीं रंग-बिरंगी तितलियां भी सिमट कर रह गई हैं। शेर, बाघ, चीते अब गिनती के रह गए हैं। वहीं हाथी दांतों के लिए मानव के हाथों मारे जा रहे हैं। असल में जैविक विभिन्नता को तहस-नहस करने में बहुत ज्यादा हाथ मानव का ही दिख पड़ता है। प्रगति के पहिए का चक्र समृद्धि का द्योतक माना जाता है, परंतु अपनी सुविधा के लिए हम कुछ भी कर गुजरने को तैयार नजर आते हैं। विषैली दवाइयां, कीटनाशक हर पल जैविक व्यवस्था को तहस-नहस करने का कार्य कर रहे हैं, परंतु मानव के आगे संसार के प्रत्येक जीव ने अपने घुटने टेक दिए हैं। वर्तमान संदर्भ में कई बातों से आमजन सहमत होंगे कि फसलों में अच्छे गुणों की फसल विकसित करने का चलन निरंतर जोर पकड़ता जा रहा है। उसके विस्तृत स्तर पर उपयोग के कारण स्थानीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि उपयोगी स्थानीय व पारंपरिक प्रजातियों की विविधता बनाए रखने पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। मैं नहीं कहता कि समय की मांग व खेतीबाड़ी के बदलते स्वरूप में हम नवीन तकनीकों से कई गुना ज्यादा फसल पैदा करने में सक्षम हुए हैं, परंतु नवीन फसलों संग पारंपरिक प्रजातियों की अवहेलना करना भी उचित नहीं है। आज मानव को जैव विविधता के संरक्षण के बारे में सचेत हो जाने की आवश्यकता है। हमें जैविक संस्थानों के प्रबंधन के लिए आगे आना चाहिए। जैव विविधता मानव सभ्यता के विकास का स्तंभ है। इसलिए इसका संरक्षण करना अति आवश्यक है। जैव विविधता हमारे भोजन, कपड़ा, औषधीय व रहन-सहन के स्तर को सुधारती व जरूरतों की पूर्ति करती है। जैव विविधता पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक होती है। इसके अतिरिक्त यह प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा आदि से भी राहत प्रदान करती है। हमारे प्रदेश में समय-समय पर जैव विविधता के संरक्षण के लिए कार्यशालाओं, सेमिनारों व स्कूल स्तर पर जागृति का बिगुल तो बजाया जाता रहा है, परंतु वर्तमान परिस्थितियों में प्रकृति के समीप रह रहे ग्रामीण आम जनमानस को इसकी महत्ता से ओतप्रोत करने की जरूरत है।

आमजन जैविक विविधता से अनजान बने रहने की परिपाटी से बाहर निकल कर ही पर्यावरण संरक्षण संग जैव विविधता का संरक्षण करने में सक्षम होगा। जागृति स्वरूप प्रत्येक जन को प्रण लेना चाहिए कि जाने-अनजाने वह कभी भी जल प्रवाहों में विषैली चीजें प्रवाहित नहीं करेगा, क्योंकि जलीय जीवों का नदियों व जलाशयों में ज्यादा मात्रा में तबाही के मंजर आए दिन देखने को मिलते हैं। आम जनमानस को जैव विविधता के संरक्षण के लिए समय-समय पर अपनी चेष्टाएं दिखानी चाहिएं, जिससे भविष्य की तबाही से बचा जा सके।

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