ज्वाला माता मंदिर

मां के 51 शक्तिपीठों में से एक कांगड़ा स्थित प्रसिद्ध ज्वाला जी शक्तिपीठ विश्व विख्यात है। ऐसा ही माता ज्वाला का एक मंदिर जिला सिरमौर के पच्छाद विकास खंड के अंतर्गत आने वाली नेरी नावन पंचायत के लाना रावना नामक गांव में भी है, जहां पर माता का रुष्ट स्वरूप समय-समय पर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाता रहता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार यहां पर ज्वाला माता के अस्तित्व के बारे में पौराणिक कथाएं व किंवदंतियां हैं, जिन्हें वे अपने पूर्वजों से सुनते आए हैं। उसी के मुताबिक गांव के समीप एक ठोढ मठ है, जहां पर एक सिद्ध गुरु इतवार नाथ जी योग साधना करते थे। एक बार त्रिकालदर्शी गुरु इतवार नाथ जी गंगा स्नान हेतु हरिद्वार गए। वहां पर उन्हें मां ज्वाला के दर्शन हुए, जो वहां पर गंगा स्नान हेतु आई थीं। उन्होंने मां ज्वाला को ठोढ क्षेत्र में निवास करने को आमंत्रित किया, जिसे माता ने स्वीकार कर लिया। ऐसा आश्वासन मिलने के पश्चात गुरु इतवार नाथ माता की अनदेखी करके किसी और काम मे व्यस्त हो गए, जिससे माता रुष्ट हो गई। गुरु इतवार नाथ ने अपने सबसे प्रिय व योग्य शिष्य बालगिरी को दीक्षा दे कर मां ज्वाला को प्रसन्न करके ठोढ क्षेत्र में स्थापित करने का आदेश दिया। बालगिरी ने कठोर तप किया। अंततः मां ज्वाला ने बालगिरी को साक्षात दर्शन दिए। जिस पर बालगिरी ने माता से इस क्षेत्र में रहने का अनुरोध किया तथा जब भी वो माता का स्मरण कर आह्वान करे, माता उसे साक्षात प्रकट हो कर दर्शन दें। माता ने उन्हें मनोकामना पूरी करने का आशीर्वाद देते हुए, कांगड़ा आने का आदेश दिया। इसके उपरांत यह वृत्तांत बालगिरी ने अपने गुरु इतवार नाथ को बताया। गुरु ने कहा कि उचित समय आने पर तुम्हें कांगड़ा स्थित मां ज्वालाजी के दरबार में जाने की प्रेरणा खुद मिल जाएगी। इसी दौरान बालगिरी ने साधना करने के लिए महासू की रोऊ नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया। वहीं गुरु इतवार नाथ ने गिरी गंगा के तट पर जीवित समाधि ले ली। इसी दौरान बालगिरी ने माता की प्रेरणा मिलने पर शुभ मुहूर्त में कांगड़ा की यात्रा प्रारंभ कर दी। मां ज्वाला के दर पहुंच कर बालगिरी ने पूजा-अर्चना करके माता को अपने साथ चलने का आग्रह किया। मां ने उसे साक्षात दर्शन देकर पिंडी रूप में उसके साथ चलने का निर्णय लिया। अनेक दिनों की यात्रा के पश्चात माता के पिंडी रूप को लेकर बालगिरी महासू की रोऊ नामक स्थान के करीब लाना रावना नामक स्थान पर पहुंचे। अब तक बालगिरी को अपने ऊपर गर्व हो गया था। वहां विश्राम करने के उपरांत उन्होंने माता का आह्वान करके उन्हें साक्षात दर्शन देने के लिए कहा, लेकिन माता उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से प्रकट नहीं हुई। जब माता ने बालगिरी द्वारा बार-बार आह्वान करने पर भी उन्हें दर्शन नहीं दिए, तो उन्होंने माता की पिंडी को वहां गिरी नदी में एक गहरे स्थान पर फेंक दिया और स्वयं ठोढ मठ आ गए। कुछ समय पश्चात जहां माता की पिंडी को फेंका गया था, वहां से आग की नीली लपटें निकलने लगीं, जिससे इलाके की चिनलगी विरादरी के लोग डर गए और उन्होंने अज्ञानता वश इसे कोई दैत्य का प्रकोप मानते हुए जवेणु नामक इलाके के बाहुबली के आदेश पर एक बछड़े की बलि दे दी, जिससे माता और रुष्ट हो गई और वहां पर भयंकर आग की लपटें निकलने लगी व हिंसक जंगली जानवर लोगों का भक्षण करने लगे। इलाके के जाब्याना, सोडा धियारी, लाना रावना इत्यादि गांवों के लोगों की नींद हराम हो गई। इस पर इलाके के लोग सच्चाई जानने के उद्देश्य से समीप के गांव जाखना जमलोग जहां के ब्राह्मण काफी विद्वान व प्रसिद्ध थे, के पास अपनी समस्या के समाधान के लिए पहुंचे व उन्हें सारा वृत्तांत सुनाया। उसके उपरांत गांव का एक विद्वान ब्राह्मण जिसका नाम जुहाभाट था, उनके साथ आया। उसने अपनी गणना व विद्या से पता लगा लिया कि यह तो साक्षात ज्वाला माता है। जो कि निषिद्ध बलि देने से क्रोधित हो गई है। अंत में उस ब्राह्मण ने पूजा अर्चना करके अपनी जीभ माता को अर्पित करके शांत किया और माता को एक मंदिर में स्थापित कर दिया। उधर जब बालगिरी को पूरे घटनाक्रम का पता चला, तो पश्चाताप के आंसू बहाते हुए माता के चरणों मे गिर गया तथा क्षमा याचना करने लगा। उसने माता की पिंडी को निकाल कर उसे लाना रावना गांव में मंदिर में स्थापित किया , लेकिन माता ने वहां के लोगों को पुजारी के रूप में अपनी पूजा करने के लिए निषेध कर दिया। आज भी मंदिर का पुजारी बाहर के गांव से नियुक्त किया जाता है। वहीं माता ने जाखना जमलोग गांव के ब्राह्मण को वरदान दिया कि भविष्य में तुम्हारे वंशज के बिना मेरी पूजा सफल नहीं होगी। वर्ष में दो बार नवरात्रों में यहां पूजा अर्चना के पश्चात भंडारे का आयोजन किया जाता है। जिसमें आसपास के इलाके के हजारों लोग माता की पूजा अर्चना करते है व माता उन्हें आशीर्वाद दे कर उनकी मनोकामना पूरी करती है।

विशेष – ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर माता अभी भी रुष्ट है और जब कभी माता अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो इलाके की जमीन नदी तक फटने लग जाती है। इस क्षेत्र में कभी-कभी सफेद व लाल पानी दिखाई देता है तथा क्षेत्र की मिट्टी कही लाल व कहीं काली है जैसे भट्टी में जलने के समय होती है। जमीन भी लगतार फट रही है। वैज्ञानिक भी यहां का परीक्षण कर चुके हैं, परंतु किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे।

सुविधाएं- यह मंदिर सराहां से वासनी  बड़ू साहिब संपर्क मार्ग पर जबयना गांव के समीप स्थित है। सराहां से 35 किमी. दूर स्थित इस मंदिर को सड़क मार्ग से जोड़ दिया गया है। मंदिर की देखरेख के लिए कमेटी गठित की गई है। साधना व आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए ये अति उत्तम स्थान है।       

-संजय राजन, सराहां

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