‘तीन तलाक’ बिल की परिणति

बेशक मुस्लिम महिलाओं को ‘तीन तलाक’ कहना एक सामाजिक और मानवीय कुरीति है। यह कहीं नहीं लिखा है कि देश की सरकार और संसद इसमें दखल नहीं दे सकते। देश संविधान से चलता है, लिहाजा उसमें शरिया कानून की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकार और संसद इस्लाम और कुरान के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं कर रही है, लिहाजा देश को कुरान और संविधान में बांट कर मत देखिए। सर्वोच्च न्यायालय के ‘असंवैधानिक’ करार देने के बावजूद तीन तलाक के 229 मामले सामने आए हैं। केंद्र सरकार के अध्यादेश पारित करने के बाद भी 31 ‘तलाक’ दिए जा चुके हैं। यानी तीन तलाक कहने या लिखने वालों को न तो शीर्ष अदालत और न ही सरकार का खौफ है। इस लिहाज से देखें, तो संसद द्वारा नया कानून बनाने के बावजूद कुछ बेहतर हालात की उम्मीद करना फिजूल है। फिर भी कानूनी और संवैधानिक बेडि़यां तो होनी चाहिए, लेकिन इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक दल अब भी पूरी तरह विभाजित हैं। जो स्थितियां और समीकरण दिसंबर  2018 में थे, आज भी वैसे ही हैं। कांग्रेस समेत विपक्ष का विरोध तो स्वाभाविक है, लेकिन सत्तारूढ़ एनडीए के सहयोगी जनता दल-यू और अन्नाद्रमुक भी बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं? राज्यसभा में इन दलों के क्रमशः 6 और 13 सांसद हैं। यह विरोध वैचारिक नहीं है, क्योंकि हमारी राजनीति विचार पर केंद्रित नहीं है। दरअसल यह वोटबैंक की नाराजगी की चिंता है। यदि बीजद और वाईएसआर कांग्रेस भी प्रस्तावित बिल के खिलाफ हैं, तो मुसलमानों की नाराजगी और उनके अलग छिटकने का अंदेशा है, लेकिन मुस्लिम वोट बैंक में औरतें भी तो शामिल हैं, जिनमें लाखों ऐसी हैं, जो ‘तीन तलाक’ से पीडि़त और बेघर हैं। यदि वे नाराज होकर कहीं और धु्रवीकृत हो जाएंगी, तो मुस्लिमवादी दलों का ही नुकसान होगा। अब सवाल यह है कि संसद में यह बिल पारित कैसे होगा? मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल के दौरान लोकसभा में बिल आसानी से पारित करा लिया था। इस बार जनादेश और भी विराट और व्यापक है, लिहाजा लोकसभा में कोई दिक्कत नहीं है। उच्च सदन राज्यसभा में समीकरण बदल रहे हैं, लेकिन सत्ता पक्ष अब भी अल्पमत में है। उसके अपने घटक दल ही खिलाफ हैं। वे बिल के विरोध में वोट करेंगे या सदन से गैर-हाजिर हो जाएंगे, फिलहाल यह निश्चित नहीं है। सरकार ने कोई रणनीति तो सोची होगी, लेकिन फिर भी सवाल है कि क्या इस बार भी ‘तीन तलाक’ बिल की नियति और परिणति पहले जैसी ही होगी? क्या यह बिल लटक कर रह जाएगा और फिर अध्यादेश जारी करना पड़ेगा? गौरतलब यह है कि तलाक दिए बिना ही मुस्लिम औरतों को घर से बाहर खदेड़ने के कई मामले सामने आए हैं। यदि तलाक भी होता है, तो मुस्लिम पत्नी के हाथ खाली ही रहते हैं। बिल में ऐसा प्रावधान क्यों न जोड़ा जाए कि तलाक के वक्त सात या दस दिनों के अंतराल में पति एक-तिहाई संपत्ति तलाकशुदा महिला के नाम करे। मौजूदा बिल में यह प्रावधान नहीं किया गया है। यदि संसद के दोनों सदनों में बिल के पारित होने के समीकरण बनते हैं, तो यह प्रावधान संशोधन के साथ जोड़ा जा सकता है। उससे मुस्लिम महिला का ज्यादा सशक्तिकरण होगा। मोदी सरकार ने इस बिल को लेकर जितनी जल्दबाजी दिखाई है, उससे साफ है कि यह भाजपा की प्राथमिकता है, लिहाजा राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कराने से पहले ही इस बिल को नए सिरे से लोकसभा में पेश किया गया है। हालांकि ऐसी कोई संवैधानिक अड़चन नहीं है। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी इस बार ‘मुसलमानों के भाईजान’ बनकर कुछ नया साबित करना चाहते हैं, लिहाजा इस बिल पर फोकस है। हालांकि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का बार-बार कहना है कि यह नारी सम्मान, नारी गरिमा और नारी के इनसाफ का बिल है। सियासत ऐसे ही कथनों में लिपट कर आगे बढ़ती है। बहरहाल ‘तीन तलाक’ और ‘निकाह-हलाला’ सरीखी कुरीतियों का खात्मा करने के मद्देनजर हमारी राजनीति सहमत होगी या नहीं अथवा धर्म, जाति, पंथ और वोटबैंक के चक्कर में बंटी रहेगी, ये बेहद नाजुक सवाल हैं। यदि संसद में ही इन्हें संबोधित नहीं किया जा सकेगा, तो फिर देश कहां और किसके पास जाए?

You might also like