दीदी का क्या होगा?

Jun 12th, 2019 12:05 am

पश्चिम बंगाल में जो हिंसक, जानलेवा और अराजक हालात हैं, क्या उनकी परिणति राष्ट्रपति शासन ही है? केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा के लिए यह सांप-छूछुंदर वाली स्थिति है। यदि किसी विकल्प के अभाव में भारत सरकार, बंगाल की ममता सरकार को बर्खास्त कर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन थोपती है, तो सहानुभूति ममता बनर्जी के पक्ष में पैदा हो सकती है। विपक्ष को एक साझा मुद्दा मिल सकता है और ‘दीदी’ अनशन-धरने पर बैठ सकती हैं। यदि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं किया जाता है, तो राज्य को कब तक खून से लथपथ होते देखा जा सकता है? राजनीतिक हिंसा और हत्याओं का दौर कब तक मूकदर्शक बने देखा जा सकता है? ये सवाल स्वाभाविक हैं और परंपरा के नाम पर उनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, तो बंगाल के मद्देनजर आखिरी फैसला क्या होगा? राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकातें की हैं। गृहमंत्री को अलग से 20 मिनट तक राज्यपाल ने ब्रीफ किया है कि बंगाल में ऐसे हिंसक और उपद्रवी हालात क्यों हैं? गृह मंत्रालय के सूत्रों की खबर है कि राज्यपाल ने बंगाल के अराजक हालात पर पांच पन्नों की एक रपट भी दी है। रपट राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पास बताई गई है, लेकिन उसमें राष्ट्रपति शासन की सिफारिश नहीं की गई है। प्रधानमंत्री मोदी भी राष्ट्रपति शासन के पक्षधर नहीं हैं, लिहाजा बंगाल में अनुच्छेद 356 के आसार फिलहाल नहीं हैं। दरअसल अनुच्छेद 356 एक ‘संवैधानिक ब्रह्मास्त्र’ है। उससे पहले अनुच्छेद 355 एक ऐसा संवैधानिक विकल्प है, जिसके तहत गृह मंत्रालय संबंधित राज्य को चेतावनी देता है। संभवतः केंद्रीय गृह सचिव ने बंगाल के मुख्य सचिव को ऐसा चेतावनी-पत्र लिखा भी होगा! अब सवाल यह है कि बंगाल के विभाजक और सांप्रदायिक हालात का समाधान क्या है? यदि बंगाल को भद्र, सभ्य, समाज सुधारक जनों की जमीन कहा जाता है, तो वह स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि महान विभूतियों की विरासत और संस्कृति के कारण ही ऐसा है। वहां उसी जमीन पर लोग एक-दूसरे की हत्या करने पर आमादा हैं। भाजपा का आरोप तृणमूल कांग्रेस पर है और तृणमूल भाजपा को कसूरवार मान रही है। सच क्या है, यह जांच का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन सरकार में होने के कारण दायित्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी कानून-व्यवस्था का है। उसके उलट ममता ‘पीडि़त’ की मुद्रा में हैं। वह सार्वजनिक रूप से जो बोल रही हैं, उसके मायने हैं कि भाजपा उन्हें डराना, दबाना और तोड़ना चाहती है। केंद्र उनकी सरकार गिराना चाहता है, जिसे वह कभी होने नहीं देंगी। ममता के इस भय और खौफ में भी सच का सारांश निहित है। लोकसभा चुनाव ने साबित कर दिया है कि अब बंगाल में भाजपा भी समानांतर राजनीतिक शक्ति बन गई है। दीदी की तृणमूल के 22 सांसद जीत कर आए, तो भाजपा के भी 18 सांसद बंगाल से लोकसभा तक पहुंचे हैं। विधानसभा चुनाव 2021 में होने हैं। ऐसे ही हालात रहे, तो पहले भी कराए जा सकते हैं। राज्य स्तर पर भी भाजपा चुनौती बनकर उभरी है। यानी 2021 के चुनाव में ममता की सत्ता खिसक भी सकती है। लिहाजा इस भयाक्रांत मानस में ही उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मरने-मारने का अघोषित आदेश दिया है। राजनीतिक हिंसा वाममोर्चे की सत्ता के दौरान परवान चढ़ी। ममता उसी से संघर्ष करती सत्ता तक पहुंची हैं। अब उसे गंवाने का भय कम नहीं होता। बंगाल में लगातार 34 साल तक सरकार चलाने वाले वाममोर्चे का जनाधार आज सिकुड़ कर मात्र 6.28 फीसदी रह गया है और उसका काडर बहुत तेजी से भाजपामय हो रहा है। यदि मौजूदा हालात में ही विधानसभा चुनाव हो जाएं, तो मात्र तीन विधायकों की भाजपा के 125 से अधिक विधायक जीत कर आ सकते हैं। हालांकि संभावित 164 विधायकों के साथ 295 के सदन में बहुमत तृणमूल का ही होगा, लेकिन असल में चुनाव होने तक हालात और समीकरण बदल भी सकते हैं। इसी भय और आशंका के कारण ‘दीदी’ ऐसे काम भी कर रही हैं, जो हिंदू धर्म के खिलाफ हैं। वह मुस्लिमों के तुष्टिकरण की बात सार्वजनिक तौर पर कबूल करती हैं। इनसे धार्मिक धु्रवीकरण भी तेज होता है, लिहाजा राजनीतिक समीकरण भी ‘ममता बनाम भाजपा’ बनते हैं, तो इन परिस्थितियों में ‘दीदी’ खुद को ‘कुर्बान’ करने की मुद्रा में दिखना चाहती हैं, ताकि उनका जनाधार और काडर संगठित रहे। क्या ऐसा संभव है? फिलहाल तो यही मौजूदा सवाल है।

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