धूमधाम से मनाया जाता है शिवरात्रि का त्योहार

शिवरात्रि के दिन घर की स्त्रियां सारा दिन घी या तेल में तला हुआ पकवान बनाने में व्यस्त हो जाती हैं। बच्चे खेतों में जाकर जौ के हरे पौधे, चेरी की टहनियां और छंबू के पत्ते लाकर उनका एक हार तैयार करते हैं, जिसे ‘चांदवा’ कहते हैं और यह घर की छत से रस्सी से लटकाया जाता है। चांदवे के नीचे गोबर से लीप कर आटे से चौक या मंडल बनाया जाता है। गोबर या मिट्टी की शिवजी-पार्वती की मूर्तियां बनाकर चौक में रखी जाती हैं…

गतांक से आगे …

शिवरात्रि  :

शिवरात्रि के दिन घर की स्त्रियां सारा दिन घी या तेल में तला हुआ पकवान बनाने में व्यस्त हो जाती हैं। बच्चे खेतों में जाकर जौ के हरे पौधे, चेरी की टहनियां और छंबू के पत्ते लाकर उनका एक हार तैयार करते हैं, जिसे ‘चांदवा’ कहते हैं और यह घर की छत से रस्सी से लटकाया जाता है। चांदवे के नीचे गोवर से लीप कर आटे से चौक या मंडल बनाया जाता है। गोवर या मिट्टी की शिवजी-पार्वती की मूर्तियां बनाकर चौक में रखी जाती हैं और सायंकाल इनकी पूजा करने के बाद तेल या घी में तले पकवान खाए जाते हैं।  सारी रात शिवजी की महिमा का गान किया जाता है और सवेरे चार बजे के लगभग घर का एक बड़ा आदमी उन मूर्तियों को उठाकर आदर सहित जौ के खेतों में छोड़ आता है – चांदवा भी कमरे में किसी दूसरे जगह लटका दिया जाता है। शिवरात्रि वाले दिन बच्चे, छोटे-छोटे समूहों में जाकर ‘करंगोड़ा’ और ‘पाजा’ वृक्षों की छोटी-छोटी टहनियां लाते हैं और घर के दरवाजे से लटका देते हैं। ऐसा करने से भूत-प्रेतों और जादू-टोने के भाग जाने का विश्वास किया जाता है। कई स्थानों पर इस दिन बकरे काटना और उनका मांस खाना शुभ माना जाता है। अगले दिन घर का एक व्यक्ति किल्टे में पकवान डालकर रिश्तेदारों के गांवों में जाकर उनके घर पकवान बांटता है। इस कार्य को करने में कई बार उसे हफ्ते लग जाते हैं। शिवरात्रि के मनाए जाने के बारे में भी कई लोक-गाथाएं हैं। कई कहते हैं कि शिव इस दिन पाताल से कैलाश पर्वत में आए थे। कई इसे शिव का विवाहोत्सव के रूप में मनाते हैं। लिंग पुराण में शिवजी ने पार्वती से इस दिन की महिमा का वर्णन किया है कि जो लोग इस दिन व्रत रखकर मेरी पूजा करेंगे, वे मेरे समीप समझे जाएंगे और शिवजी ने उस ब्याध की कथा सुनाई है जो जीते ही स्वर्ग पहुंच गया, क्योंकि उसे शिवरात्रि के दिन अनजाने में शिवलिंग प बेलपत्र रखे और अनजाने में शिव के नाम का उच्चारण कर लिया। कथा इस प्रकार है कि ब्याध जंगल में एक बेल के वृक्ष पर चढ़ गया, जिसके नीचे शिव-पिंडी थी। अचानक बेल के पत्र उससे शिव पिंड पर गिर गए और उसके मुख से शिव शब्द निकला। कई हिरण उसके पास आए, परंतु उसने उन्हें नहीं मारा। ऊपर से देवता आए और उसे उठाकर ले गए। मंडी तथा बैजनाथ का शिवरात्रि उत्सव सारे हिमाचल तथा उत्तरी भारत में प्रसिद्ध है। मंडी शिवरात्रि अंतरराष्ट्रीय पर्व घोषित किया जा चुका है।

नाग पंचमी: यह श्रावण मास की शुक्लापक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। यह नागों की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करने का त्योहार है।

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