ध्यान सिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई ने संभाला कार्यभार

ध्यान सिंह की मृत्यु के समय उसका पुत्र विक्रम सिंह बालक था। उसका जन्म 1893 में हुआ था। इसलिए राज्य का कार्यभार ध्यान सिंह के भाई मियां मान सिंह के पास रहा। वह वजीर के तौर पर काम करता था। 1905 ई. में फिर एक विद्रोह उठ खड़ा हुआ। यह विद्रोह समस्त कनैत जाति के लोगों ने वजीर और उसके सभी भाइयों के विरुद्ध किया था। सुपरिंटेंडेंट हिल स्टे्टस को इस बार भी हस्तक्षेप करना पड़ा…

गतांक से आगे …

विक्रम सिंह (1904-1922 ई.) : ध्यान सिंह की मृत्यु के समय उसका पुत्र विक्रम सिंह बालक था उसक जन्म 1893 में हुआ था। इसलिए राज्य का कार्यभार ध्यान सिंह के भाई मियां मान सिंह के पास रहा। वह वजीर के तौर पर काम करता था। 1905 ई. में फिर एक विद्रोह उठ खड़ा हुआ। यह विद्रोह समस्त कनैत जाति के लोगों ने वजीर और उसके सभी भाइयों के विरुद्ध किया था। सुपरिटेडेंट हिल स्टे्टस को इस बार भी हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार ने कांगड़ा के एक नायब तहसीलदार मियां शेर सिंह को मियां मान सिंह के साथ मैनेजर लगाया। इससे स्थिति में सुधार आया। मियां शेर सिंह ने रियासत में भूमि बंदोबस्त कराया जो 1908 में पूरा हुआ। 1909 ई. में मियां मान सिंह और शेर सिंह के स्थान पर सरकार ने राय साहब हाकिम सिंह को मैनेजर नियुक्त किया। वह प्रबंध 1921 तक रहा। 1921 में सरकार ने विक्रम सिंह को राज्य के कुछ अधिकार दिए और मैनेजर हाकिम सिंह को वजीर नियुक्त किया। सन् 1922 में राणा की मृत्यु हो गई।

सुरेंद्र सिंह (1922-1944 ई.) : विक्रम सिंह की मृत्यु के समय सुरेंद्र सिंह की आयु 13 वर्ष थी उसका जन्म सन् 1909 में हुआ था। इसलिए प्रशासन का काम पंडित वरत चंद को दिया गया जो विक्रम सिंह के समय में राज्य का वजीर था। वह सन् 1927 में लाला खान चंद को मैनेजर बनाया गया। जनवरी, 1932 में सरकार ने सुरेंद्र सिंह को राज्य के अधिकार दे दिए। राजा को अंग्रेज वायसराय से मिलने का अधिकार था। 1911 तक बाघल रियासत पर नजराना कानून लागू था फिर दिल्ली राज्यभिषेक सम्मेलन 1911 में इसे समाप्त कर दिया गया। राज्य को 25 तोपची रखने का अधिकार था तथा एक सेवा गन भी। राजा के सैल्यूट की व्यवस्था नहीं थी। इसके समय में पंचायत पद्धति को बढ़ावा दिया गया और फल उत्पादन के लिए प्रयास किए जाने लगे। धुंड ठकुराई के कुंवर शिव सिंह इस राजा के समय में 1937 से रियासत के वजीर रहे। पहाड़ी रियासतों में बहुत समय से चले आ रहे प्रजामंडल के आंदोलन ने चौथे दशक में जोर पकड़ा और इससे बाघल भी अछूता न रह सका। वहां के लाला प्रभुदियाल, मनसाराम और हीरा सिंह पाल आदि ने इसके लिए कार्य किया। सन् 1944 में सुरेंद्र सिंह की मृत्यु हो गई।

राजेंद्र सिंह (1945-1948) : राजेंद्र सिंह का जन्म 29 फरवरी, 1928 को तथा शिक्षा कर्नल ब्राऊन स्कूल दून तथा सरकारी कालेज लाहौर से हुई। राजा ने रियासत में कई प्रशासनिक व संवैधानिक सुधार किए। उनका विवाह क्योंथल की राजकुमारी रानी तारादेवी से दो नवंबर, 1948 को हुआ, वह राजा हितेंद्र सेन की बेटी थी। रानी तारा को देहांत 22 फरवरी, 2005 को हुआ, उनकी तीन संतान हैं।

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