नसीरुल्लाह ने बेगम की तकलीफों के पल साझा किए

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन ः एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है ग्यारहवीं किस्त…

-गतांक से आगे…

एक रात, शहनाज ने सपना देखा कि फरिश्ते उनकी मां को बादलों के पार ले जा रहे हैं। वह डरकर उठ गईं और अगले कुछ घंटे रोते हुए प्रार्थना करती रहीं। आज इतने सालों बाद भी मुझे अपनी मां के उस दर्द का अहसास होता है कि परियों की कहानी सुनकर सोने की उम्र में वह अपने जीवन की इतनी बड़ी चुनौती का सामना कर रही थीं। सईदा बेगम बेहद धार्मिक महिला थीं, जो अपना ज्यादा समय नमाज अता करने में लगाती थीं। राहत मंजिल में की गई तलवारबाजी या पोलो मैदान की टे्रनिंग उन्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे पर दिखते डर का सामना करने की हिम्मत नहीं दे पाई। उन्हें लगता था कि वे अपने परिवार के साथ धोखा कर रही हैं, तो उनके सामने अपनी गिरती सेहत को संभालने के लिए दुआओं के अलावा और कोई चारा ही नहीं था। डा. मर्चेंट अपनी ओर से हरसंभव कोशिश कर रही थीं, और कुछ हफ्ते पेंसिलीन देने से सईदा बेगम संक्रामकता के खतरे से उबर चुकी थीं। उस दुख के समय में यह बात डूबते के लिए तिनके के सहारे के समान थी। बच्चे जल्दी से अपनी मां से जाकर लिपट गए। उन्होंने छोटी शहनाज को देखा और मुस्कुराकर वादा किया, ‘मेरी बच्ची, मैं नहीं मरने वाली, जब तक तुम्हारी शादी नहीं हो जाएगी, मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगी।’ नसीरुल्लाह बेग बहुत गंभीर इनसान थे। उन्होंने अपनी बेगम की तकलीफों का एक-एक पल साझा किया था। अपने समय के बड़े वकील होने के नाते, उन्हें अपने क्लाइंट और बच्चों को देने वाले समय में काफी संतुलन बैठाना पड़ रहा था। उस दौरान, मेरी मां की फर्स्ट कजिन मेहर आपा उनके साथ रहने आईं। उनके स्नेह की चादर तले बच्चों के दो साल मानो पंख लगाकर उड़ गए। वह बच्चों का ध्यान रखतीं, उन्हें घुमाने ले जातीं, हंसाती और उनके गम भुलाने में मदद करतीं। मेरी मां की जिंदगी में मेहर आपा का खास मुकाम है और आज भी वह उन्हें बेहद प्यार से याद करती हैं। मेहर आपा ने अपनी छोटी सी कजिन को खुश करने की हरमुमकिन कोशिश की। बच्चे लगभग हर शाम लखनऊ के रेजिडेंसी गार्डन में घूमने के लिए जाते थे। एक दिन, बसंत ऋतु की शुरुआत में, गार्डन फूलों से भरा हुआ था, उन्होंने एक सुनहरा स्पैनियल कुत्ता, जैनी देखा, जिसका पट्टा उसके वृद्ध अंग्रेज मालिक के हाथ में था। जैनी बच्चों को देखकर उनके पास दौड़ी चली आई और अपनी पूंछ हिला-हिलाकर उनसे अपना प्यार जताने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उनका दर्द समझती हो और उन्हें खुश करने की कोशिश कर रही हो। अब बच्चों के पार्क आने में एक नया रोमांच जुड़ गया था। हर शाम बच्चे पार्क में जैनी के लिए बिस्किट और छुटपुट सामान लेकर जाने लगे, और जैनी मि. लिटिल, अपने मालिक के साथ बच्चों का इंतजार करने लगी।    

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