नसीरुल्लाह ने बेगम को बुरके से आजाद किया

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन ः एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है नवीं किस्त…

-गतांक से आगे…

आखिरकार, उन्होंने निर्णय ले ही लिया-आजादी पसंद नहीं बल्कि वह अधिकार है, जो उनकी बेगम के पास होना ही चाहिए। भले ही वह आदतन इस हथकड़ी को पहने हुए हों, लेकिन उन्हें अपनी बेगम के इस बंधन को तोड़ना ही होगा। आगे बढ़कर, बुरका उठाकर उन्होंने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया और अपनी बेगम के चांद से चेहरे को हमेशा के लिए बंधनों से आजाद कर दिया। अब नसीरुल्लाह राहत मंजिल में कमरे के बाहर बेकरारी से आने वाले मेहमान की प्रतीक्षा कर रहे थे, उनकी बेगम लेबर पेन से छटपटा रही थीं। सईदा, बेहद सब्रबख्श महिला थीं, जो कभी-कभार ही अपने दर्द के निशान दिखाती थीं, अन्यथा वह चुपचाप दर्द सहते हुए अपने खुदा को याद करती रहती थीं। आखिरकार दरवाजा खुला और मुस्कुराते हुए डाक्टर बाहर निकलीं। ‘मुबारक हो मि. बेग, बेटी हुई है।’ नसीरुल्लाह के वालदैन, समीउल्लाह बेग और उनकी बेगम, अपनी नई पोती को दुआएं देने आए थे। समीउल्लाह ने प्यार से बच्ची को देखते हुए कहा, ‘शहनाज’-शाह का फख्र। यह नाम आगे चलकर खुद को सही साबित करने वाला था, शहनाज अपने अब्बू की दुलारी थीं।

मां का आंचल थामे

सईदा बेगम ने अपनी छोटी बेटी शहनाज को लखनऊ के स्कूल, ला मार्टिनी कालेज में डाला। गर्मियों में एक दिन वह पहली बार अपने स्कूल गईं। लखनऊ में गोमती नदी के किनारे बनी आलीशान बिल्डिंग उस समय अंग्रेजों का गढ़ हुआ करती थी और शहनाज उन कुछ भारतीय छात्रों में से थीं, जिन्हें उसमें पढ़ने का मौका मिला था। मां का हाथ थामे, उन्होंने आसपास देखा, कुछ हैरानी से, सोचते हुए कि सभी बच्चों के बाल भूरे क्यों हैं। उस दोपहर जब शहनाज भागते हुए स्कूल गेट पर आईं-कुछ चिंता से कि कहीं उन्हें यहां हमेशा के लिए तो नहीं छोड़ दिया गया है, तो धूप में इंतजार करती अपनी अम्मी को देखकर वह खिल गईं। वह अपनी क्रिस्प कॉटन साड़ी के पल्लू को नजाकत से अपने सिर पर थामे खड़ी थीं। शहनाज भागकर उनके साथ इंतजार करती गाड़ी में सवार हो गईं। लखनऊ की दोपहर से उनींदी हुई गलियों से गुजरकर वे एक तीन मंजिला हवेली के सामने आकर रुके। बीच लखनऊ में बसा मार्बल हाउस, बेग का खानदानी घर था। इस इमारत का निर्माण एक अंग्रेज सुनार ने करवाया था, जो बाद में इंग्लैंड में ही सैटल हो गया। बेग ने यह जायदाद इसके साथ लगी दुकानों की जमात और पूरे परिसर, जिसमें 20 घर भी थे, के साथ खरीद ली थी।  

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