नेरवा अस्पताल में डिलीवरी करवानी हो तो साथ लाएं दाई

नेरवा—सीएचसी नेरवा का अकसर विवादों में रहना आम बात हो गई है। अस्पताल में लापरवाही एक ऐसा ही एक मामला सामने आया है। हुआ यूं कि काली बहादुर नाम का नेपाली अपनी पत्नी मोनिका को प्रसव पीड़ा शुरू होने पर मंगलवार की शाम चार बजे नेरवा अस्पताल लाया। मोनिका को अस्पताल में बिस्तर पर लिटाने के बाद उसका आधार कार्ड मांगा गया परंतु नेपाली के पास आधार कार्ड नहीं था। लिहाजा उसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया। इस दौरान अस्पताल में कोई भी चिकित्सक मौजूद नहीं था और न ही  कोई अन्य कर्मचारी मोनिका की सुध लेने आया। नौ बजे के करीब जब प्रसव पीड़ा अत्यधिक बढ़ गई तो काली बहादुर ने मजबूर होकर अपनी एक अन्य संबंधी अमृता को अस्पताल बुला लिया। अमृता ने अस्पताल पहुंच कर रात दस बजे मोनिका का प्रसव भी करवाया व लेबर रूम की सफाई भी की। अब  सवाल यह उठता है की इनसानी जिंदगी के आगे क्या एक सरकारी दस्तावेज इतना जरूरी था की दो-दो जीवन एक साथ दांव पर लगा दिए गए। यह मामला प्रकाश में आने पर स्थानीय लोगों में अस्पताल प्रशासन के खिलाफ  रोष व्याप्त है एवं लोगों ने स्वास्थ्य मंत्री से इस मामले की जांच करवाने की मांग की है। इस विषय में बीएमओ नेरवा डा. सुनील नेगी से बार-बार संपर्क करने का प्रयास किया गया परंतु उनका मोबाइल स्विच ऑफ  पाया गया। बता दें कि नेरवा अस्पताल को सिविल अस्पताल का दर्जा पांच साल पहले 2014 में मिल चुका है परंतु अस्पताल में सुविधाएं प्राथमिक अस्पताल की भी पूरी नहीं है। अस्पताल में चिकित्सकों और पैरा मेडिकल स्टाफ  के कई पद रिक्त पड़े हुए हैं। इसके अलावा अस्पताल भवन का निर्माण कार्य भी तीन सालों से चला हुआ है परंतु अभी तक इसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया है। अस्पताल में जगह की कमी का हाल यह है कि न तो चिकित्सकों के बैठने की पर्याप्त जगह है और न ही उपकरण रखने के लिए स्थान है। लोग बीते पांच सालों से सरकार से इस अस्पताल की दशा सुधारने की गुहार लगा कर थक चुके है परंतु सरकार की तरफ  से इस मामले में कोई भी दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है।

 

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