पठनीयता के साथ विश्वसनीयता का संकट

संदर्भ : शिमला पुस्तक मेला

इस वर्ष पहले धर्मशाला में पुस्तक मेला लगा, अब शिमला में बुक फेयर लगने जा रहा है। भविष्य में भी ऐसे पुस्तक मेले होते रहेंगे, परंतु एक सवाल अकसर खड़ा हो जाता है कि साहित्य को आखिर पाठक क्यों नहीं मिल रहे हैं? इसी प्रश्न को खंगालने का प्रयास हमने इस बार ‘प्रतिबिंब’ में किया है। प्रदेश भर के साहित्यकारों से हमने इसका जवाब ढूंढने की कोशिश की। यहां पेश है इस विषय में शृांखला की दूसरी और अंतिम कड़ी :

 

पठनीयता के साथ विश्वसनीयता का संकट

डा. आत्मा रंजन

सवाल बहुत मौजूं है कि साहित्य के सामने पाठकों का अभाव क्यों है! जवाब तलाशते हैं तो संदर्भ के कई पहलू हमारे सामने खुलते जाते हैं। हालांकि इस सवाल को देखने-विचारने के कोण भी प्रकाशक और लेखक के तनिक भिन्न हैं। आज हम देखते हैं कि जीवन के प्रत्येक शोबे को राजनीति और बाजार बेतरह प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि अनाधिकृत तरीके से संचालित ही कर रहे हैं। इससे भी आगे बारीकी से पड़ताल करें तो पाते हैं कि राजनीति भी कारपोरेट के आगे आज गिरवी सी दिखाई देती है। ऐसे में नीति निर्धारण से लेकर जीवन के हरेक रब-ढब बाजार ग्रस्त हैं।

बाजार की मूल प्रवृत्ति ही बाजारू है, बाजार चाहता है कि हम कुछ खरीदें, कुछ बेचें…बस सोचें-विचारें नहीं। इस तरह विचार और सृजन बाजार के मूल स्वभाव के ही विपरीत हैं, तो स्वाभाविक है कि बाजार में सोचने-विचारने, लिखने-पढ़ने के लिए स्पेस नहीं बनता या बचता है। दूसरी बड़ी संचालक शक्ति यानी राजनीति की बात करें तो वहां भी स्थिति भिन्न नहीं। वहां भी एक खांचे से बाहर स्वतंत्र रूप से सोचना-विचारना या रचना खतरे की तरह लिया जाता है।

इधर देख ही रहे हैं कि कुछ बरसों में राजनीति प्रश्न करने को घोर आपत्तिजनक मान रही है, बल्कि देशद्रोह तक के लांछनों की तोहमत से नवाज रही है। यानी वहां भी सोचने या रचने का स्पेस न के बराबर है। यही स्थिति धर्म सत्ता की भी है। असल में धर्म, राजनीति और बाजारवादी सत्ताओं को सोचना या रचना सूट ही नहीं करता। उन्हें सोचने-विचारने वाले मनुष्य नहीं, अपने लिए यंत्रवत अनुयायी चाहिए। अंध भक्त। और सत्ता की चाटुकारिता करता तथाकथित साहित्य या चारण गान साहित्य होता भी कहां है? साहित्य की मूल प्रकृति या मूल स्वभाव ही दरअसल प्रतिरोधी होता है। वह शासक नहीं, शासित के पक्ष में होता है। वह शोषक नहीं, शोषित के पक्ष में होता है।

इस तरह तमाम सत्ताएं और सृजन परस्पर विरोधी स्वभाव है। सत्ताएं सृजन को झेल तक नहीं पातीं, तो सपोर्ट करना तो दूर। वे उसे गैरजरूरी मानने और माने जाने की फिराक में रहती हैं। और ऐसा माहौल बनाने की भी भरसक कोशिश करती हैं। संरक्षण के नाम पर भी आडंबर ही अधिक, तो व्यवस्थाएं पढ़ने की संस्कृति को सपोर्ट नहीं करती। पठनीयता के संकट के ये कई आयाम तो हैं ही, लेखक का पक्ष भी बहुत माकूल नहीं। मुझे तो बहुत गहराई से यह लगता है कि साहित्य में आज पठनीयता के संकट के साथ बड़ा संकट विश्वसनीयता का भी है।

साहित्य में हम जिन मूल्यों को स्थापित करते हैं और व्यवहार में उन मूल्यों के विपरीत आचरण करते पाए जाते हैं तो कोई हमारे लिखे पर क्यों विश्वास करे, उससे कोई क्यों जुड़ेगा। किसान, मजदूर, भूख, गरीबी, शोषण की बड़ी-बड़ी बातें और जीवन में व्यावहारिक जीवन में इन सब से कोई निकटता नहीं बल्कि हिकारत ही…!

लेखक व्यावहारिक जीवन में जब तक खुद को डीक्लास नहीं करता यह जुड़ाव संभव नहीं। यह दूरी बरकरार रहेगी और पठनीयता का संकट भी। इन सवालों पर सभी पक्षों को गंभीरता से विचार करना चाहिए क्योंकि पुस्तक और पुस्तक संस्कृति हमारे मानव और मानवीय बने रहने के लिए निहायत जरूरी हैं।

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