पर्यटकों के सैलाब से छोटा पड़ता प्रदेश

वीरबल शर्मा

लेखक, मंडी से हैं

गर्मियों की छुट्टियों के चलते इतना पर्यटक यहां पहुंचने लगा कि सड़कें छोटी पड़ गईं। मीलों तक कई-कई घंटे जाम की स्थिति बनी, हालात यह हो गए कि हजारों को वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा। कहा जा सकता है कि जाम के चलते जो परेशानियां पर्यटकों व स्थानीय लोगों को आ रही हैं, पूरी व्यवस्था लाचार व तहस-नहस नजर आती है…

70 लाख की आबादी वाले हिमाचल में हर साल दो करोड़ से भी ज्यादा पर्यटक पहुंचने लगे हैं, जो अपने आप में एक चौंका देने वाला आंकड़ा है। अढ़ाई दशक पहले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं के बढ़ने के बाद देश-विदेश के सैलानियों ने हिमाचल प्रदेश की ओर रुख किया है, जिसका सिलसिला हर साल बढ़ता ही जा रहा है। अब इस प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं, जिनमें अच्छी सड़कों की कमी, पार्किंग की सही व्यवस्था न होने, ट्रैफिक पुलिस में तालमेल व अतिथि देवो भवः का अभाव, ठहराव के लिए एक योजना के तहत पर्याप्त व साफ-सुथरा वाजिब कीमत का स्थान न होना, सही पर्यटन नीति न होने के चलते एक भयंकर समस्या पर्यटन सीजन में बन गई है। गर्मियों के दिनों में पर्यटकों के लिए यहां पर आनंद और उल्लास की बजाय घंटों तक जाम की विकराल होती स्थिति व अन्य परेशानियां अत्यधिक बढ़ने लगी हैं। यदि इस स्थिति को एक योजनाबद्ध तरीके से संभाला न गया, तो इससे प्रदेश को पर्यटन में बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है।

हिमाचल प्रदेश में मुख्य तौर पर दो तरह के पर्यटक आते हैं। प्रथम श्रेणी में ऐसे पर्यटक आते हैं, जो प्रदेश के सौंदर्य, यहां की संस्कृति, रीति-रिवाजों, मेले-त्योहारों, प्राचीन मंदिरों, बौद्ध मठों, कुदरती झीलों या फिर ठंडे रेगिस्तान के नाम से मशहूर स्पीति घाटी को देखने आते हैं। दूसरी श्रेणी के पर्यटक वह हैं, जो जैसे ही देश के मैदानी क्षेत्रों में गर्मी प्रचंड रूप लेती है, स्कूलों में बच्चों को छुट्टियां हो जाती हैं, तो लोग ठंडे पहाड़ों यानी हिमाचल का रुख करते हैं। पहली श्रेणी के लोग प्रदेश में पूरा साल आते हैं, भले ही गर्मियों में इनकी तादाद बढ़ जाती है। ये पूरे हिमाचल में घूमते हैं या फिर अपनी पसंद की जगहों पर जाते हैं। जो दूसरी श्रेणी के पर्यटक हैं, बिना किसी योजना के सीधे देश-विदेश में बर्फ के लिए मशहूर समुद्र तल से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रोहतांग पास को ही जहन में रखकर घरों से निकलते हैं, उनके दिमाग में सीधे रोहतांग का रोमांच रहता है। इस रोमांच को पाने की लालसा में वे जहां ठगी का शिकार होते हैं, वहीं कई बार खुद तैयार की गई अव्यवस्था, तो कई बार सिस्टम को संभालने वालों की लापरवाही का शिकार होकर घंटों तक सड़कों पर लगे जाम में ही फंसे रहते हैं। चंडीगढ़ से मंडी होते हुए मनाली और फिर पर्यटकों के पसंदीदा रोहतांग का सफर लगभग 366 किलोमीटर है। मैदानी पैमाने से मान कर चलने वाले पर्यटकों के जहन में यह सफर सात-आठ घंटे का रहता है, मगर जब इसके लिए किसी के दो दिन से ज्यादा समय लग जाए, तो कल्पना की जा सकती है कि इन दिनों यहां वाहन चल नहीं रहे, बल्कि रेंग रहे हैं। इस साल देश में गर्मी का नया रिकार्ड कायम हो जाने के चलते पिछले सालों से डेढ़ गुना पर्यटक ज्यादा यहां पर पहुंच रहे हैं, इससे सारी व्यवस्थाएं कम पड़ गई हैं और सारी सड़कें पैक होकर रह गई हैं। सड़कों पर घंटों तक जाम, मीलों लंबी वाहनों की कतारें, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच खून जमा देने जैसे ठंडे-बर्फीले निर्मल जल वाली कल-कल करती बहती ब्यास, पार्वती, सैंज व तीर्थन नदियों के बावजूद जब गाड़ी में एसी चलाकर घंटों बैठना पड़े, तो यह कैसा पर्यटन? यही हाल हो गया है इन दिनों हिमाचल प्रदेश की इस सबसे बड़ी लाइफ लाइन कीरतपुर-मनाली का, जो आगे लेह तक जाती है। बीते सप्ताह जब देशभर में प्रचंड गर्मी पड़ रही थी, तो पर्यटकों के इस रेले से हिमाचल प्रदेश छोटा पड़ गया। गर्मियों की छुट्टियों के चलते इतना पर्यटक यहां पहुंचने लगा कि सड़कें छोटी पड़ गईं। मीलों तक कई-कई घंटे जाम की स्थिति बनी, हालात यह हो गए कि हजारों को वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा। कीरतपुर से मनाली तक फोरलेन का निर्माण कार्य, यातायात व्यवस्था में तालमेल की कमी, पार्किंग का कोई प्रावधान न होना, उद्दंड प्रवृत्ति के पर्यटकों द्वारा लाइन तोड़ कर दाएं-बाएं से ओवर टेक करके जाम को बढ़ाना, जहां-तहां गाड़ी खड़ी करके मस्ती करना जाम के जहां प्रमुख कारण हैं, वहीं रोहतांग जाने के लिए जो परमिट व्यवस्था  है, उसमें बड़े स्तर पर हो रहा घालमेल इसका प्रमुख कारण है। कहा जा सकता है कि जाम के चलते जो परेशानियां पर्यटकों व स्थानीय लोगों को आ रही हैं, पूरी व्यवस्था लाचार व तहस-नहस नजर आती है, उसमें अधिकांश का कारण मैनमेड यानी अव्यवस्था ही है।

मनाली से रोहतांग जाने के लिए दिन में 1200 गाडि़यों को परमिट दिए जाते हैं, मगर यहां पर रोजाना पांच हजार वाहन क्यों, कैसे और किस तरह पहुंच रहे हैं? आठ से दस घंटे तक 56 किलोमीटर के इस सफर में लग रहे हैं, रोहतांग के रोमांच को पर्यटक आधी रात को ही रवाना हो रहे हैं और फिर दूसरी आधी रात को लौट रहे हैं। कुल्लू-मनाली घाटी के एक होम स्टे मालिक किशन श्रीमान का कहना है कि इन दिनों हर रोज घाटी में एक लाख से अधिक पर्यटक आ रहे हैं, 20 हजार से अधिक वाहन रोजाना यहां पहुंच रहे हैं। कहीं भी पार्किंग की सही व्यवस्था नहीं है, यहां-वहां गाडि़यां पार्क कर दी जाती हैं और मामूली सा अवरोध पैदा होते ही जाम लग जाता है, जो पूरा दिन बना रहता है। इस बारे में पर्यटन से जुड़े व पर्यावरण प्रेमियों राजेश, यश, नरेंद्र सैणी व कमलेश वर्मा का मत है कि पर्यटकों के लिए रोहतांग को ही टारगेट करना गलत है, क्योंकि प्रदेश के कई क्षेत्र अद्भुत सौंदर्य के प्रतीक हैं। चंडीगढ़ से मनाली-रोहतांग की ओर निकलते हुए यदि पर्यटकों को कोलडैम, सराजघाटी, शिकारी देवी, कमरूनाग, ज्यूणीघाटी, देवीदड़, बरोट, खीर गंगा, मणिकर्ण, पार्वती घाटी, पराशर, बीड़ बिलिंग, तीर्थन घाटी, बंजार, सोझा, सरयोलसर आदि की ओर मोड़ा जाए, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की ओर सरकार को ध्यान देना होगा। ईको टूरिज्म, जिसमें स्थानीय ढांचे की बजाय टैंट कालोनियां बनाकर पर्यटकों को सुविधा दी जा सकती है, से आधी समस्या अपने आप ही खत्म हो जाएगी, क्योंकि कंकरीट के शहरों में बदलते हिमाचल के प्रमुख पर्यटक स्थल आने वाले दिनों में पर्यावरण के लिए बड़ा चैलेंज साबित हो सकते हैं।

You might also like