पर्यटन और आफत

– रविंद्र सिंह भड़वाल, कोपड़ा, नूरपुर

मैदानी इलाकों की बढ़ती तपिश के बीच यह स्वाभाविक था कि सुकून की खोज वहां के लोगों को पहाड़ पर ले आती, लेकिन एक व्यवस्थित पर्यटन नीति के अभाव में आज हिमाचल फिर उसी दुविधा में उलझा नजर आता है कि इन आगुंतकों को पर्यटकों के रूप में देखे या बिना मंजिल की भीड़ के। पर्यटन किसी भी अर्थव्यवस्था और सामाजिक संस्कृति को सकारात्मक ढंग से प्रभावित करता है, लेकिन जब यही अव्यवस्थित पर्यटन तमाम बड़े शहरों के बीचोंबीच ट्रैफिक जाम का सबब बनता है, तो खामियां हमारी पर्यटन नीति में भी ढूंढी जाएंगी। पर्यटक हर साल हिमाचल आता है और आगे भी आता रहेगा, मगर इस वर्ग की जरूरतों को समझते हुए क्या प्रदेश सरकारें पार्किंग की समुचित व्यवस्थाएं खड़ी कर पाई हैं? मैदान से पहाड़ में आने वाला पर्यटक यहां की सड़कों के खतरों से भी वाकिफ नहीं होता है। ऐसे पर्यटकों को प्रवेश द्वार पर ही संभावित खतरों के बारे में आगाह करना क्या सरकार का कर्त्तव्य नहीं है? आखिर ऐसे कितने वाहनों का चालान ट्रैफिक पुलिस ने किया, जहां माल वाहनों में सवारियां ढोई जा रही थीं या दूसरे वाहनों में क्षमता से अधिक सवारियां सफर पर निकल गईं? सामाजिक बुराइयों में विस्तार को क्या हम पर्यटन आर्थिकी मानने की भूल कर सकते हैं? ऐसी ढेरों खामियां और भी मिल जाएंगी, जो पर्यटन और नकारात्मक पहलुओं में विभेद कर देंगी। बात हाथ से निकल जाए, उससे पहले प्रदेश सरकार को पर्यटन नीति में जरूरी सुधार कर लेने चाहिएं, ताकि देवभूमि की बुनियादी पहचान को विकृत होने से बचाया जा सके।

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