पर्यटन के मद्देनजर

Jun 10th, 2019 12:04 am

अरविंद शर्मा

धर्मशाला

इस समय गर्मी अपनी चरम सीमा पर है, ऐसे में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली इत्यादि के लोग चैन पाने के लिए कुछ रोज पहाड़ों में गुजारने के लिए निकल पड़ते हैं, किंतु अभी तक पर्यटकों के इतने बड़े सैलाब को झेलने की समर्थता यह प्रांत जुटा ही नहीं पाया है। नतीजतन यहां आना पर्यटकों के लिए सुकून से बिलकुल विपरीत परेशानी का सबब बन कर रह जाता है। अमीर एवं अति व्यस्त पर्यटक यहां हवाई जहाज से आना चाहता है। हिमाचल में कुल्लू, शिमला और धर्मशाला तीन हवाई अड्डे हैं। धर्मशाला हवाई अड्डा राज्य का सबसे व्यस्त है। घरेलू हवाई अड्डे से प्रतिदिन चार उड़ानें दिल्ली तथा जयपुर के लिए होती हैं। धर्मशाला से दिल्ली तक का विमान किराया उत्तरी भारत का सबसे महंगा किराया है। सवा  घंटे की उड़ान के लिए हवाई किराया 8,000 रुपए से लेकर 12,000 रुपए तक वसूला जाता है। आज कल के हालात यानी पीक सीजन में यह हवाई यात्रा 18,000 से 21,000 रुपए तक की भी हो जाती है। धर्मशाला हवाई अड्डे पर आमतौर पर 70 सीटों वाले विमान ही आते हैं। यदि हवाई अड्डे का विस्तार किया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और बड़े जहाजों के आने से पर्यटकों को सीधी उड़ानों के अतिरिक्त  कम किराए का लाभ मिल सकता है। यदि धर्मशाला की ही बात करें, तो यहां होटल एसोसिएशन के सदस्यों का मानना है कि यहां लगातार ट्रैफिक जाम और पुलिस द्वारा प्रबंधन की कमी के कारण ज्यादातर पर्यटक मकलोडगंज तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। उन्होंने बेहतर यातायात प्रबंधन के लिए मकलोडगंज में और अधिक पुलिस बल तैनात करने के लिए जिला प्रशासन को एक ज्ञापन भी सौंपा है। यह सच है कि इन पर्यटक क्षेत्रों में लगभग रोजाना सडक़ें पर्यटकों की गाडिय़ों से एकदम जाम हो जाती हैं। यह भी सच है कि अधिकतर होटलों के पास अपनी पार्किंग ही  नहीं है। सडक़ों पर पर्यटकों की वॉल्वो बसों की पार्किंग भी समस्या को और बढ़ा देती है।  इसके लिए प्रदेश की जयराम सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे। अधिकारियों द्वारा जो भी छोटे-मोटे पार्किंग स्थल बनाए जाते हैं, उन्हें अधिकतर लोकल गाडिय़ों की स्थाई पार्किंग से जाम कर दिया जाता है। सरकार को सभी पर्यटक स्थलों में पैदल चलने वालों के लिए शिमला की तर्ज पर माल रोड बना कर बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, पैदल यात्रियों और पर्यटकों को सुरक्षित स्थान देकर आकर्षित करना होगा। हर शहर के बाहर बड़ी-बड़ी पार्किंग बना कर शहरों के भीतर पर्यटकों को अपनी बसों या रज्जु मार्गों से लाने की व्यवस्था करनी होगी। इसके अतिरिक्त उत्तर-पूर्वी राज्यों की तर्ज पर सस्ती वायु यात्रा उपलब्ध करवा कर भी पर्यटक वाहनों की संख्या घटाई जा सकती है। पठानकोट-मंडी रेल परियोजना को सिरे चढ़ा कर भी इस समस्या का काफी हद तक निपटारा हो सकता है।

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