पिपलू मेला : भगवान नृसिंह की पिंडी रखने से हरा हुआ था सूखा पीपल…

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां अनेक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। ऐसा ही एक भगवान नृसिंह का मंदिर जिला ऊना की बंगाणा तहसील के तहत पीपलू नामक स्थान पर स्थित है। बंगाणा से सात किलोमीटर की दूरी पर पिपलू में प्रतिवर्ष लगने वाला वार्षिक पिपलू मेला जहां हमारी धार्मिक आस्था व श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को भी सदियों से संजोए हुए है। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में ऊना क्षेत्र के हटली महेड़ गांव के उतरू नामक किसान को एक दिन स्वप्न हुआ कि जंगल में जाकर आमुक स्थान पर जमीन मे गड़ी शिला को निकालो और उसे नगरोट (अब पिपलू गांव के सूखे पीपल के नीचे रखो। उतरू किसान प्रातः उठकर उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचा। औजारों से खुदाई कर एक शिला मिली, वह शिला को घर ले गया, जिससें उसकी आंखों की रोशनी चली गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और पीपल की ओर क्षमा याचना करने से उसी क्षण उसकी दृष्टि ठीक हो गई। उसने शिला को उसी सूखे पीपल के नीचे रख दिया। कुछ दिन बाद पीपल हरा हो गया, जो कि आज भी विद्यमान है। पीपल का महत्त्व बढ़ने लगा, तो बैसाखी नामक व्यक्ति ने भूमि दान की। तत्कालीन कुटलैहड़ रियासत के राजा महेंद्रपाल के पूर्वजों ने मंदिर बनवाया। प्रारंभ में गांव बाग के 6-7 परिवार इस स्थान पर लगभग 300 वर्ष पहले आए थे। कैलाश शर्मा जो इस परिवार से संबंध रखते हैं और आजकल मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष है, ने इसकी पुष्टि की है। विपन कुमार उपप्रधान का कहना है कि मंदिर की लगभग 6 कनाल भूमि है, जिसमें प्राचीन मंदिर तथा कीर्तन हाल बना है। मंदिर गुंबद आकार है, जो दक्षिणी भारत की वास्तु कला का नमूना है। मंदिर में पूजा-अर्चना होती रहती है। प्रातः 8 बजे से पूजा आरती शुरू हो जाती है और 10 बजे भगवान नृसिंह को भोग लगाया जाता है फिर लंगर प्रसाद बांटा जाता है। हिंदुओं के सभी शुभ दिनों, नवरात्र, निर्जला एकादशी पर विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। निर्जला एकादशी के दिन लोग विशेषकर महिलाएं व्रत रखती हैं और भगवान के मंदिर में शिलाओं पर चढ़ावा अर्पणकर अपने व परिवार की सुख समृद्धि की कामना करती हैं। ऊना जिला व हमीरपुर की सीमा पर स्थित यह स्थान भक्तिमय व श्रद्धा का केंद्र बन जाता है, जहां हजारों लोग अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मन्नत मांगने आते हैं। यहां उस दिन मीठे पानी का शरबत पिलाया जाता है। लोग भजन कीर्तन, संगत गीत, लोकगीत, बांसुरी ढोल, नगारें बजाते आते हैं। कुश्ती का खेल भी होता है और बैलों पश्ुओं की मंडी लगती है। जिला प्रशासन द्वारा पानी, बिजली, सुरक्षा का उचित प्रबंध किया जाता है। मेले के दौरान जहां स्थानीय लोग अपनी नई फसल को भगवान नृसिंह के चरणों में चढ़ाते हैं, वहीं भगवान का आशीर्वाद प्राप्त कर धन्य होते हैं। मेले के दौरान सदियों से बजती आ रही टमक की धमक आज भी पिपलू मेले में वैसे ही है, जैसे सैकड़ों वर्ष पूर्व रही है। लोग आज भी टमक की मधुर धुन में मस्त नजर आते हैं और मेले का लुत्फ  उठाते हैं।

–  डा. ओपी शर्मा, शिमला

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