पुस्तकालय से पुस्तक मेले तक

Jun 16th, 2019 12:05 am

शिमला पुस्तक मेले की हलचल में अब तक पुस्तकालयों में हाजिरी लगा रहे छात्र, शिक्षक व अन्य लोग पुस्तक मेले में भी शिरकत करने आए। पुस्तकालयों व पुस्तक मेले में वे कौनसी पुस्तकें ढूंढ रहे हैं, पाठ्यक्रम से इतर उनकी पसंदीदा पुस्तकें कौनसी हैं, भविष्य का पुस्तकालय कैसा होना चाहिए, पुस्तक मेले की क्या खूबी उन्हें पसंद आई, क्या वे पुस्तक मेले के आयोजन से संतुष्ट हैं तथा पुस्तकों की उनके लिए क्या उपयोगिता है, इन विषयों पर हमने प्रतिभागियों के विचार जानने की कोशिश की। प्रतिबिंब के इस अंक में इन्हीं प्रश्नों पर प्रतिभागियों के विचार पेश कर रही हैं                                दीपिका शर्मा…

विषय को सिखाने में किताबों का महत्त्व ज्यादा

दीक्षा ठाकुर

दीक्षा ठाकुर शिमला के आरकेएमवी कालेज में पढ़ती हैं। वह हिंदी की छात्रा हैं। वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अकसर पुस्तकालय जाती हैं। वह कहती हैं कि उन्हें किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। जब उन्हें यह मालूम पड़ा कि गेयटी में पुस्तक मेला भी लगा है तो पुस्तक मेले की खबर सुनकर वह तुरंत गेयटी थिएटर में मेला देखने आ गईं। यहां पर रखी गई किताबों को लेकर वह काफी संतुष्ट हैं। शिमला की रहने वाली दीक्षा ने बताया कि किताबें पढ़ना किसी विषय को जल्द सिखाने में मदद करता है। वह कहती हैं कि एक पुस्तकालय ऐसा होना चाहिए जहां पर सभी प्रकार की ज्ञानवर्धक पुस्तकें होनी चाहिए। यहां पर प्रतियोगी पुस्तकें भी मिली हैं जो बहुत ही प्रभावशाली हैं। इनमें एक पुस्तक डा. अब्दुल कलाम के जीवन को लेकर दिखाई गई है जो उन्होंने खरीदी भी है। इस तरह के आयोजन से वह संतुष्ट हैं। स्कूल में इतनी सारी पुस्तकें एक साथ नहीं मिल पाती हैं, लेकिन इस तरह के आयोजन से मेले में बड़े साहित्यकारों से भी मिलना हो जाता है और सभी तरह की किताबें एक छत के नीचे मिल पाती हैं। वह कहती हैं कि अपने अध्ययन को लेकर ही नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य को लेकर कुछ ऐसी पुस्तकें भी हैं जो इस तरह पुस्तक मेले के आयोजन में मिल जाती हैं। भवानी प्रसाद मिश्र की किताबें भी पुस्तक मेले में दिखाई दी हैं। इस पुस्तक मेले में कहानी की किताबें भी काफी प्रभावित कर रही हैं। दीक्षा ठाकुर ने बताया कि आज के यूथ किताबें कम तथा मोबाइल व इंटरनेट से अधिक पढ़ाई करते हैं। दीक्षा का मानना है कि जो ज्ञान उन्हें किताबों में मिलेगा, वह इंटरनेट में नहीं मिल पाता। इस मेले में हर पुस्तक बहुत खास है और यहां पर अधिकतर ऐसी पुस्तकें हैं जो पुस्तकों की दुकानों में आसानी  से नहीं मिल पाती हैं। उन्होंने बताया कि वह बचपन से ही पुस्तकों की शौकीन हैं।

स्कूलों के पुस्तकालय मजबूत करने की जरूरत

तन्मय

शिमला के ही तन्मय की उम्र छोटी जरूर है लेकिन वह लाइब्रेरी जाता है। शिमला के एक स्कूल में पांचवीं कक्षा के छात्र तन्मय का कहना है कि उन्हें कहानियों की किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद है। तन्मय कहते हैं कि वह शिमला में आयोजित पुस्तक मेले के दौरान  कहानियों की किताबें ही ढूंढ रहे हैं। इसमें लेखक एसआर हरनोट की कीलें नामक किताब तन्मय ने खरीदी है। पुस्तक मेले के  आयोजन के बारे में छात्र कहता है कि यदि रोज पुस्तकालय जाएं तो जीवन में कुछ नया सीखने को मिलता है। कहानियों में ही कुछ ऐसे संदेश होते हैं जो बहुत अच्छे लगते हैं।

ये कई बार जीवन की दिशा ही बदल देते हैं। वह अपने बड़े भाई के साथ इस पुस्तक मेले में पहुंचे। मेले में उन्होंने बहुत अच्छी-अच्छी पुस्तकें देखी। तन्मय को कार्टून, गेम्स, स्टोरी किताबें पढ़ना बहुत पसंद है। उनकी सबसे प्रिय पुस्तक हेरोल्ड एंड दि पर्पल क्रेयोन है। इस पुस्तक में उन्हें हेरोल्ड की कहानी अच्छी लगी जिसमें चांद तक जाने का रास्ता बताया गया है। वहीं इस पुस्तक मेले से तन्मय ने एडवेंचर पुस्तक भी खरीदी है। उन्होंने बताया कि किताबों के साथ उनका अच्छा समय गुजरता है। वह अपने दोस्तों को भी उनके जन्मदिन के अवसर पर एक पुस्तक व पेन उपहार में देते हैं। पांचवीं कक्षा के छात्र तन्मय, जो एक अच्छे पाठक भी हैं, कहते हैं कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों को मजबूती दी जानी चाहिए। इस तरह के मेले के आयोजन से वह काफी संतुष्ट हैं। छात्र तन्मय कहते हैं कि यदि कम उम्र में पढ़ने के लिए अभिभावक भी बच्चों में पढ़ने  की दिलचस्पी पैदा करें तो वे गेम्स की ओर नहीं भागेंगे।

स्कूल स्तर पर भी होने चाहिए पुस्तक मेले

अनु

शिमला के एक निजी स्कूल में शिक्षक के तौर पर काम कर रही अनु का कहना है कि पुस्तकें शिक्षकों को भी पढ़ने की प्रेरणा देती हैं। अनु घणाहटी के एक स्कूल में पांचवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाती हैं। अनु कहती हैं कि पुस्तक मेला एक ऐसा आइना होता है जो एक पाठक को उसका आइना भी दिखाता है। वह कहती हैं कि एक शिक्षक के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह सभी पुस्तकालयों में जाकर एक सर्वे करे कि वहां पर कौन से पाठक कौन सी पुस्तकें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। शिमला में आयोजित मेले से वह संतुष्ट हैं, लेकिन इसमें एक ऐसा कोना होना चाहिए था जिसमें शिक्षकों द्वारा लिखी गई पुस्तकें ही मिल पाएं। वह इस पुस्तक मेले में व्यंग्यात्मक पुस्तकों को ढूंढ रही हैं। खासकर युवाओं को इस मेले में आना चाहिए। इस तरह उन्हें गेम्स से दूर रखा जा सकता है। इस तरह के आयोजन को स्कूली स्तर पर भी आयोजित किया जाना चाहिए। मतलब यह कि स्कूलों में भी पुस्तक मेलों का आयोजन होना चाहिए। वह कहती हैं कि वह छोटे बच्चों को पढ़ाती हैं जिसके कारण वह पुस्तक मेले में अकसर कहानियों की किताबों को खरीदना ज्यादा पसंद करती हैं। अनु कहती हैं कि भविष्य में पुस्तकालय के दर्शन करने हो तो ये देखना चाहती हैं कि हर जिले के स्कूलों में पुस्तकों की एक स्पेशल कलेक्श्न होनी चाहिए जिससे बच्चों में पढ़ने की एक इच्छा पैदा हो पाएगी। शिक्षक अनु कहती हैं कि प्रदेश सरकार को भी इस ओर गौर करना चाहिए। शिक्षकों के लिए अलग से कलेक्शन को स्कूलों में ही उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।

भविष्य के पुस्तकालय का स्वरूप सुधारें

रवितन्या शर्मा

शिमला की रहने वाली रवितन्या शर्मा कहती हैं कि वह स्वयं भी लिखती हैं। महज सात वर्ष की आयु में उन्होंने लिखना शुरू किया। रवितन्या सेंट बीड्स की छात्रा हैं। वह इकोनोमिक्स और पालिटिकल साइंस पढ़ रही हैं। वह द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। वह कहती हैं कि उनकी दो पुस्तकें छपी भी हैं जिसमें उन्होंने अपने अभी तक के जीवन की यात्रा पर एक पुस्तक लिखी है। इस मेले में उनकी किताबों का भी स्टॉल लगा है, लेकिन वह भी इस पुस्तक मेले में घूमते हुए कविताओं और ऑटोबायोग्राफी की पुस्तकों को पढ़ने के लिए ढूंढ रही हैं। पाठ्यक्रम के अलावा उनकी पसंद किसी की जीवन यात्रा पर छपी पुस्तक को लेकर ज्यादा रहती है। भविष्य में पुस्तकालयों के रूप को और मजबूत होना चाहिए। इसमें खास तौर पर स्कूली बच्चों की पुस्तकों का भी होना जरूरी है। वह मेले के आयोजन से बिल्कुल संतुष्ट हैं क्योंकि हर उम्र वर्ग की पुस्तकें इसमें शामिल हैं। शिमला पुस्तक मेले में सभी तरह की पुस्तकें देखने को मिल रही हैं। रवितन्या की लाइफ  इज ब्यूटीफुल और ब्यूटी ऑफ  लाइफ  पुस्तकें आई हैं। रवितन्या कहती हैं कि सफल बनने के लिए हमें बचपन से बताया जाता है कि महान लोगों की जीवनी पढ़ें। ऐसा करने से उनके आदर्शों व जीवन के अनुभवों से प्रेरणा मिलती है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए वह महान लोगों की जीवनी या साहित्यकारों की किताबें पढ़ना बहुत पसंद करती हैं। उन्हें अपने माता और पिता से भी लिखने की प्रेरणा मिली है। रवितन्या ने मेले की खूब प्रशंसा की और काफी किताबों की खरीददारी भी की। वह कहती हैं कि स्कूलों में भी इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए कि सभी को पुस्तकें पढ़ने का मौका दिया जाए। वह कहती हैं कि बच्चों को इंटरनेट की दुनिया से भी बाहर निकलकर किताबें पढ़ने की प्रेरणा लेनी चाहिए। इससे एक सफल समाज का निर्माण होगा।

छात्र इंटरनेट के बजाय किताबों से अपनी पढ़ाई करें

मधु

शिमला शहर के एक निजी स्कूल में स्कूली बच्चों को पढ़ा रही मधु का कहना है कि वह लगभग पांच वर्ष से केजी व नर्सरी के बच्चों को पढ़ा रही हैं जिसमें अकसर यह देखा जा रहा है कि ये स्कूली बच्चे अब मोबाइल गेम्स की ओर रुख कर रहे हैं। शिमला में अयोजित इस मेले के आयोजन से वह काफी संतुष्ट हैं, लेकिन स्कूली बच्चों को भी इस मेले में आने के लिए न्योता दिया जाना चाहिए। वह कहती हैं कि वह अंग्रेजी कविताओं की पुस्तकों को ढूंढ रही हैं जिसमें डा. कुंवर की किताबों को पढ़ना वह ज्यादा पसंद करती हैं। वह कहती हैं कि इस तरह के आयोजन के कारण युवा जगत को भी एक संदेश जाता है। युवाओं के लिए खासतौर पर इस तरह के आयोजन के बारे में वह कहना चाहती हैं कि उनके जीवन में कठिनाइयों से लड़ने का ये पुस्तकें संदेश दे सकती हैं। शिक्षिका मधु कहती हैं कि राष्ट्रीय पुस्तक मेले में वह कविताओं की पुस्तकों को भी ढूंढ रही हैं जिन्हं वह खरीदना भी पसंद कर रही हैं। इसमें सरकार को स्कूलों के पुस्तकालयों में पुस्तकों के कलेक्शन बढ़ाने पर विचार करना चहिए। वह कहती हैं कि वह अलग-अलग तरह की पुस्तकें पढ़ना बेहद पसंद करती हैं। पुस्तकें जीवन का अहम हिस्सा होती हैं। सामाजिक-राजनीतिक बदलाव में किताबें अपना अहम योगदान देती हैं। वह यह भी कहना चाहती हैं कि युवाओं को चाहिए कि वह ऑनलाइन सुविधा से नहीं, किताबों से अपनी पढ़ाई करें। इससे उन्हें हर विषय का विस्तार से और संपूर्ण ज्ञान मिलेगा। इंटरनेट का भले ही जमाना है, लेकिन पढ़ने की कला को नहीं छोड़ना चाहिए।

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