प्रभु कृपा का एहसास

Jun 8th, 2019 12:05 am

ओशो

परमात्मा में हम हैं, परमात्मा से बिलकुल दूरी नहीं है। उसी में पैदा हुए हैं, उसी में जी रहे हैं तो पता नहीं चलता उसका। वायुमंडल का ही उदाहरण ले लो। चारों तरफ  से हम उससे घिरे हुए हैं, क्या उसका एहसास होता है हमें? पता चलता है? नहीं चलता। ऐसे ही परमात्मा से हम घिरे हुए हैं, परमात्मा का पता नहीं चलता। तो उसकी कृपा का भी पता नहीं चलता। भक्ति जिस दिन घटित होगी उस दिन पता चलेगा। जैसे हम किसी के प्रेम में होते हैं, तो वह व्यक्ति आपको सिर्फ  फूल लाकर दे तो आपके लिए बहुत बड़ी संपदा हो गई वह। आपका जीवन ही खिल जाता है। आपका जीवन ही उस फूल की सुगंध से भर जाता है और प्रेम जब संबंध बन जाता है तो क्या कुछ नहीं किया जाता एक दूसरे के लिए? क्या पता चलता है? क्या हम धन्यवाद से भरते हैं, क्या कुछ एहसास हो पाता है फिर, नहीं हो पाता। प्रेम में एहसास हो रहा था कि अगला व्यक्ति हमारे लिए क्या कर रहा है। संबंध बना एहसास खतम हो गया। हमारे शरीर में स्वास्थ है, हम इस संसार में जी पा रहे हैं भलीभांति। क्या-क्या खजाना दिया है इस शरीर में प्रभु ने। परमात्मा का द्वार भी दिया है इसी के भीतर। इसी घट के भीतर, इसी देह के भीतर सब कुछ उसने दे दिया और चैतन्य भी दिया जो कि सब कुछ महसूस करता है। वह अंतर्यामी यहीं बैठा हुआ है आकर और क्या चाहिए? तो कितनी बड़ी कृपा है उसकी। हमें क्यों कृपा महसूस नहीं होती, क्योंकि अभी हम भक्त नहीं हुए। भक्ति आई नहीं है अभी। इसको ऐसे समझो। भक्ति क्या है? कैसे हम परमात्मा के कितने-कितने निकट हो गए, कितने हम करीब होते जा रहे हैं परमात्मा के यह भक्ति है। हमारी दूरी, हमारा फैसला परमात्मा से कम होता जा रहा है। एक बच्चा है वह अपने माता-पिता के पास बड़ा होता है। माता-पिता क्या कुछ नहीं करते बच्चे के लिए। आप सभी माता-पिता हैं जानते हैं, लेकिन बच्चे बड़े होकर या उस समय क्या वह धन्यवाद महसूस करते हैं? क्या वह कृपा महसूस करते हैं माता-पिता के लिए नहीं करते। क्योंकि वह इतने शुरू से साथ रहते हैं, वहीं जन्म लिया साथ रहते-रहते वह संवेदना ही नहीं है, लेकिन वह एहसास ही नहीं बचा। क्योंकि वह अधिकार मान लेते हैं। साथ रहते-रहते उनका अधिकार है वह, तो कृपा महसूस नहीं करते और जहां एक्सपेक्टेशन है,  जहां अधिकार की भावना आई वहां संवेदना कम हो गई। वहां हमारा ध्यान कम हो गया। एहसास करने की क्षमता कम हो गई। ऐसा समझो कि कोई पहचान का व्यक्ति या कोई राहगीर आपके लिए थोड़ा सा कुछ कर दे, आपकी कोई चीज गिर गई और वह उठाकर दे दे। आप कितना धन्यवाद महसूस करते हैं। या कोई पहचान का व्यक्ति है आपके लिए थोड़ा सा कुछ हैल्प कर दिया आप कितना ज्यादा महसूस करते हो और वही काम माता-पिता करते हैं, यही काम भाई-बहन करते हैं वह महसूस नहीं कर पाते। क्यों, क्योंकि उनके साथ रहते-रहते हमें पता ही नहीं चलता। ऐसे तो परमात्मा में हमं हैं, तो इसलिए हमें पता ही नहीं चलता कि परमात्मा हमारे लिए क्या कर रहा।

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