प्रस्तावित शिक्षा नीति की चुनौतियां

डा. वरिंदर भाटिया

पूर्व कालेज प्रिंसीपल

 

मसौदे में पब्लिक फंडिंग को दोगुना करते हुए इसे जीडीपी के छह प्रतिशत तक करने का सुझाव है। साथ ही शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च को 10 फीसदी से बढ़ा कर 20 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है। चूंकि ज्यादातर खर्च राज्य को वहन करना होगा, ऐसे में हालात को देखते हुए यह काम थोड़ा मुश्किल हो सकता है…

राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली 2019 के जरिए देश की उच्च शिक्षा प्रणाली में दूरगामी बदलाव आने वाले हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रारूप में शिक्षण व्यवस्था को मुख्य रूप से चार भागों में बांटा गया है। पहले भाग में विद्यालयीय शिक्षा, दूसरे में उच्च शिक्षा और तीसरे में प्रौद्योगिकी, व्यावसायिक व वयस्क शिक्षा को रखा गया है। नई शिक्षा नीति के तहत सरकार का उद्देश्य ऐसी शिक्षण प्रणाली विकसित करना है, जहां बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर मिले और उनका विकास हो। देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में विशेष शिक्षा क्षेत्र भी स्थापित किए जाएंगे। वर्ष 2030 तक सभी बच्चों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करना भी शिक्षा नीति का हिस्सा है। उच्च शिक्षा तंत्र में व्यापक सुधार करते हुए देशभर में विश्वस्तरीय और विविध विषयों पर आधारित उच्च शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण, वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात को न्यूनतम 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। सभी उच्च शिक्षण बहुविषयक (मल्टी डिसीप्लनरी) संस्थानों में होंगे। संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से सभी विषयों और क्षेत्रों के अध्ययन को सुविधाजनक बनाया जाएगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने वाले बहुविषयक संस्थान, जो भारत में उच्च शिक्षा क्षमता का विकास और समान रूप से आमजन की पहुंच में होंगे। नई संस्थागत वास्तु संरचना, जो शिक्षण और शोध क्षमता वृद्धि में सहायक होगी। व्यावसायिक शिक्षण उच्च शिक्षा में अनिवार्य अंग होगा। उच्च गुणवत्ता पर आधारित तीन प्रकार के संस्थान होंगे। पर्याप्त सार्वजनिक निवेश किया जाएगा, जिससे सार्वजनिक शिक्षा का विस्तार और विकास होगा। भौगोलिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों को वरीयता दी जाएगी। अगले पांच वर्षों के भीतर प्रत्येक जिले में कम से कम एक टाइप-1 संस्थान होगा। सभी उच्च शिक्षा संस्थान या तो विश्वविद्यालय होंगे या डिग्री प्रदान करने वाले स्वायत्त महाविद्यालय। किसी प्रकार के संबद्ध विश्वविद्यालय या महाविद्यालय नहीं होंगे। छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए कल्पनाशील और व्यापक तौर पर उदार शिक्षण व्यवस्था बनाने की पहल होगी। चुने गए विषय और क्षेत्र में विशेषज्ञता पर जोर दिया जाएगा।

भारत में लिबरल आर्ट्स शिक्षा प्राचीन काल से ही व्याख्यायित और प्रयोग में है। यह मस्तिष्क के दोनों पक्षों का विकास करता है- रचनात्मक और विश्लेषणात्मक पक्ष। स्नातक स्तर पर चुने गए विषय में गहनता और विशेषज्ञता पर जोर होगा। विभिन्न विषयों को संचालित करने वाले संस्थानों में मास्टर्स, प्रोफेशनल प्रोग्राम पर विशेष फोकस किया जाएगा। चार वर्षीय बैचलर ऑफ लिबरल आर्ट्स, एजुकेशन विषय के विविध पक्षों पर केंद्रित होगा। तीन वर्षीय प्रोग्राम बैचलर डिग्री पर आधारित होगा। एक नई शीर्ष संस्था, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग या नेशनल एजुकेशन कमीशन का गठन किया जाएगा, जो प्रधानमंत्री के नेतृत्व में संचालित होगा। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग देश में शिक्षा के विकास, कार्यान्वयन, मूल्यांकन और दृष्टिकोण के विकास पर काम करेगा। राज्य शीर्ष स्तर पर राज्य शिक्षा आयोग या स्टेट एजुकेशन कमीशन का गठन कर सकेंगे। नियमन व्यवस्था जवाबदेहीपूर्ण और उत्कृष्टता आधारित होगी। मानक निर्धारण, वित्त पोषण, मान्यता और विनियमन जैसी व्यवस्थाओं को बेहतर तथा परस्पर स्वतंत्र किया जाएगा। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण एकमात्र सभी प्रकार की उच्च शिक्षा के लिए नियामक संस्था होगी, जिसमें व्यावसायिक शिक्षा भी शामिल होगी, सभी उच्च शिक्षा योग्यता, जो सीखने के परिणामों पर आधारित होगी। उसकी व्याख्या राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा योग्यता फ्रेमवर्क द्वारा निर्धारित की जाएगी। सभी निजी और सार्वजनिक संस्थान नियामक व्यवस्था के तहत संचालित होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदे में निश्चित ही प्रगतिशील विचारों को अहमियत दी गई है, लेकिन दिए गए सुझावों को लागू करने में वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर कई अड़चनों का सामना करना है। मसौदे में पब्लिक फंडिंग को दोगुना करते हुए इसे जीडीपी के छह प्रतिशत तक करने का सुझाव है। साथ ही शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च को 10 फीसदी से बढ़ा कर 20 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है। चूंकि ज्यादातर खर्च राज्य को वहन करना होगा, ऐसे में हालात को देखते हुए यह काम थोड़ा मुश्किल हो सकता है। हालांकि निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देने की योजना का भी जिक्र है। नियमन व्यवस्था को राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण के तहत लाया जाएगा। इसके मानकों का निर्धारण सामान्य शिक्षा परिषद और वित्तपोषण उच्च शिक्षा अनुदान परिषद द्वारा किया जाएगा। इसकी व्यापक समीक्षा करनी होगी, क्योंकि भारत के उच्च शिक्षा आयोग से संबंधित मौजूदा विधेयक से इसके प्रावधान मिलते-जुलते हैं। मसौदा नीति में इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस और हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी पर कोई स्पष्ट कार्य योजना नहीं है। व्यावसायिक शिक्षा उच्च शिक्षा का अहम और अभिन्न हिस्सा होगी। मात्र प्रोफेशनल एजुकेशन के लिए ही विश्वविद्यालय निर्माण करने की प्रक्रिया पर रोक लगेगी। केवल प्रोफेशनल या जनरल एजुकेशन आधारित संस्थानों को वर्ष 2030 तक दोनों प्रकार के पाठ्यक्रमों को एक साथ संचालित करने वाले संस्थान के रूप में विकसित किया जाएगा। हमारे यहां शिक्षा नीति बनाने में थोड़ी देर हुई, लेकिन जो नीति बनी है, वह गहन विचार-विमर्श के बाद बनी है। इसमें बहुत-सी ऐसी चीजें हैं, जो काफी फलदायी होंगी। एमएचआरडी का नाम अब शिक्षा मंत्रालय होगा, जिसे शिक्षा क्षेत्र के लोग बहुत पहले से चाहते थे। अध्यापकों की नियुक्ति के लिए भी कुछ सुझाव दिए गए हैं। इससे काफी सुधार होगा, क्योंकि  पांच-पांच, छह-छह सालों से अध्यापकों की नियुक्तियां ही नहीं हुई हैं।

शिक्षाकर्मी और मानदेय वाले अध्यापकों की प्रथा समाप्त की जाएगी, जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। इस नीति में अनेक सुझाव हैं। इन्हीं में से एक सुझाव उच्च शिक्षा में संबद्ध कालेज के कान्सेप्ट को लेकर है। एक विश्वविद्यालय से दो सौ, चार सौ कालेज संबद्ध होते हैं। इनमें से कई कालेजों में परीक्षाएं ही नहीं हो पाती हैं, होती भी हैं, तो पर्चे लीक हो जाते हैं। नतीजतन विद्यार्थी परेशान रहते हैं। इन सब परेशानियों को दूर करने के लिए संबद्ध कालेज की प्रथा धीरे-धीरे समाप्त की जाएगी। अब हर एक कालेज को अपने ढंग से शुरुआत करनी होगी। विद्यार्थियों को डिग्री देनी होगी और फिर जॉब मार्केट में उसका परिणाम देखना होगा। यह बहुत अच्छा कदम है। आजकल इंजीनियरिंग, एमबीए आदि कालेजों के बंद होने की खबरें आती रहती हैं। यहां प्रश्न उठता है कि आखिर वे कालेज क्यों बंद हो रहे हैं? उत्तर है कि मार्केट में उनकी साख नहीं बची है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि दिल्ली में सीबीएसई की साख है, लेकिन बिहार बोर्ड की परीक्षा की साख नहीं है। हालांकि इसमें सुधार की कोशिश हो रही है, जो अच्छी बात है। अब जो कालेज बच्चों की पढ़ाई के साथ खिलवाड़ करेंगे, मार्केट में उनकी साख खत्म हो जाएगी। संबद्ध कालेज का कान्सेप्ट समाप्त हो जाने के बाद विश्वविद्यालय पर कोई प्रश्न नहीं उठाएगा।

इस नई शिक्षा नीति के तहत बहुत अच्छे इंस्टीच्यूट भी बनाए जाएंगे, जहां उच्चतम स्तर का शोध होगा। इस तरह के बहुत से कदम उठाए जाने की बात ड्राफ्ट में की गई है। यह भी कहा गया है कि यूजीसी, मेडिकल काउंसिल समेत जो तमाम नियामक संस्थाएं हैं, वे अलग-अलग जिम्मेदारियों को उठाने की बजाय कोई एक काम करेंगी। जैसे यूजीसी पैसे भी दे, रेगुलेशन भी करे, मान्यता भी दे, रैंकिंग भी करे, यह सब अब नहीं होगा। अब एक संस्था एक काम करेगी, यानी जिसे गुणवत्ता की जांच करनी है, वह गुणवत्ता की जांच करेगी, जिसे मानक देखना है, वह मानक देखेगी। कुल मिला कर नई शिक्षा नीति से देश की उच्च शिक्षा में रचनात्मक बदलाव आ सकते हैं।

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