फिर याद आई प्रकृति

राकेश शर्मा

लेखक, कांगड़ा से हैं

देश की तीव्र गति से बढ़ रही आबादी जहां एक ओर गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को जन्म दे रही है, वहीं दूसरी ओर इसका सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव आज यदि कहीं पर पड़ रहा है, तो वह है हमारा पर्यावरण। इस विषय पर पहले भी बहुत बार चिंता जाहिर की जा चुकी है, लेकिन न तो इस विषय को गंभीरता से लिया जाता है और न ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति मानव की जागरूकता में बढ़ोतरी हुई है। पूरे वर्ष में सिर्फ एक दिन पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर इस विषय पर बहुत से भाषणों और कार्यक्रमों के आयोजन से इसे गंभीर विषय बनाने की कोशिश तो की जाती है, लेकिन परिणाम में कोई भी सुधार देखने को नहीं मिल रहा है।

हमारा पर्यावरण दिन-प्रतिदिन मानवीकृत कारणों से खतरे की तरफ बढ़ रहा है। आज इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं। देश के करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक गंगा नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। देश की लगभग आधी  से ज्यादा आबादी नदियों के किनारे निवास करती है, इसलिए इन नदियों के अस्तित्व पर हमेशा खतरा बना रहता है। अकेली गंगा नदी के किनारे बसने वाली आबादी ही लगभग 40 करोड़ है।

इसके अलावा देश में शौचालयों की कमी और बड़े-बड़े शहरों में मल जल को उपचारित करने का अभाव भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। अत्यधिक आबादी की वजह से मानवीय जरूरतों की पूर्ति करने में भी पर्यावरण को बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है। प्रतिदिन बढ़ रही आबादी से मानवीय आवासों की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने के लिए वनों का कटान और खनन की क्रियाएं बहुत अधिक बढ़ रही हैं। इसके अलावा गाडि़यों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुंआ पर्यावरण के लिए  कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा शहरों में बढ़ रहे वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर से लगाया जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियरों का तेज गति से पिघलना आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है। पीने के पानी की कमी, गिरता भू-जल स्तर और कचरे का अप्रबंधन बढ़ती आबादी के साथ पैदा होने वाली समस्याएं हैं, जिनका कोई स्थायी हल वर्तमान अवस्था में दिखाई नहीं देता है। पर्यावरण प्रकृति का अनमोल तोहफा है, लेकिन देश की बढ़ती हुई आबादी से यह तहस-नहस हो रहा है।

हमारे अपने लिए और हमारी आने वाली पीढि़यों के लिए इसका संरक्षण सबसे अधिक जरूरी है। हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ सालों में पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ खास प्रयास किए गए हैं, जिनमें प्लास्टिक के लिफाफों पर पूर्ण प्रतिबंध और थर्मोकोल के प्रयोग को प्रतिबंधित करना शामिल है। जमीनी स्तर पर इन आदेशों को पूरी तरह से नकार दिया जाता है और पर्यावरण सरंक्षण के ये उपाय केवल सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह जाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए आम जनमानस तक इस विषय की जागरूकता को पहुंचाने की जरूरत है अन्यथा बढ़ती हुई आबादी पर्यावरण के विनाश को पूरी तरह से तैयार है।

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