‘बलिदान’ की जांच क्यों नहीं

23 जून…डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ‘बलिदान’ की तारीख…! 1953 में इसी तारीख को उनकी कश्मीर की जेल में रहस्यमयी मौत हुई थी। उससे जुड़े सवाल आज भी कायम हैं। भाजपा नेताओं ने अपने ‘महानायक’ को श्रद्धांजलि देकर याद किया और वे सवाल करने से नहीं चूके कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने समकालीन साथी की आकस्मिक मौत पर खामोशी क्यों ओढ़ ली थी और कोई जांच तक बिठाने की कोशिश नहीं की? क्या नेहरू ने मुखर्जी के साथ कोई छल किया और तत्कालीन कश्मीरी प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को बचाया? संभव है कि उस दौर के तथ्य, साक्ष्य और ब्यौरे अब तक मिटा दिए गए होंगे, लेकिन भाजपा के लिए डा. मुखर्जी हमेशा ‘पितामह’ बने रहेंगे, लिहाजा उस रहस्य की परतें उघड़नी ही चाहिएं। डा. मुखर्जी को नेहरू की पहली कैबिनेट में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया था। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के दबाव में ऐसा करना पड़ा था। खुद नेहरू ने डा. मुखर्जी को फोन कर मंत्री पद की पेशकश की थी, लेकिन भारत-पाकिस्तान प्रधानमंत्रियों की मुलाकात और नेहरू-लियाकत समझौते का विरोध करते हुए डा. मुखर्जी ने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। इतिहास में ये तमाम विवरण दर्ज हैं। इस्तीफे के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्तूबर, 1951 को दिल्ली के गोल मार्केट इलाके के एक स्कूल में ‘जनसंघ’ की स्थापना की। जनसंघ की कोख से ही भाजपा का जन्म हुआ। पार्टी के विचार-पुरुष दीनदयाल उपाध्याय और प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा देश के प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे नेता उस दौर में डा. मुखर्जी के सहायक थे। सवाल प्रासंगिकता का नहीं है कि 1953 की घटना को 2019 में डा. मुखर्जी की पुण्यतिथि के मौके पर क्यों दोहराया जा रहा है? सवाल सत्य की तह तक पहुंचने, इतिहास को संशोधित करने और मौजूदा पीढ़ी को अवगत कराने का है। कश्मीर आज भी दहकता हुआ मुद्दा है। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए कश्मीर एक ‘मिशन’ है। संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए पर चर्चा आज भी जारी है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 66 साल पूर्व ‘बलिदान’ इस मुद्दे पर दिया था कि कश्मीर में ‘एक प्रधान, एक विधान, एक निशान’ की व्यवस्था ही होनी चाहिए। उस दौर में कश्मीर का अपना अलग प्रधानमंत्री होता था। शेख अब्दुल्ला तब इस पद पर थे। कश्मीर का अपना ही संविधान और झंडा होता था, जो कमोबेश आज भी है। बेशक प्रधानमंत्री पद खत्म कर दिया गया। हालांकि अब्दुल्ला के कुनबाई आज भी इस दुष्प्रचार को जिंदा रखे हैं कि कश्मीर का अलग प्रधानमंत्री होना चाहिए। उस दौर में परमिट लेकर कश्मीर में प्रवेश कर सकते थे, जिसका मुखर विरोध डा. मुखर्जी ने किया था। नतीजतन उन्हें जेल में डाल दिया गया था। आज 2014 से भारत सरकार में भाजपा की सत्ता है और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। 23 जून की तारीख तो हर साल आती रही है। डा. मुखर्जी के छेड़े गए आंदोलन आज भी भाजपा के लिए प्रासंगिक और राजनीतिक तौर पर सार्थक हैं, लिहाजा एक सवाल बड़ा मौजूद है कि मोदी सरकार ने एक न्यायिक आयोग बनाकर डा. मुखर्जी की आकस्मिक और संदेहास्पद मौत की जांच क्यों नहीं कराई? अभी तक नहीं करा सके, तो अब पहल करनी चाहिए। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भगवा परिवार के ‘पितामह’ ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने हिंदुओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी। यदि देश विभाजन के वक्त बंगाल पाकिस्तान में जाने से बचा था, तो डा. मुखर्जी के प्रयासों के कारण ही ऐसा संभव हो पाया था। मंत्री के तौर पर उन्होंने देश की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा की और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ निजी उद्योगों की भूमिका भी रेखांकित की। पाक अधिकृत कश्मीर किसने बनवाया? संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा कौन ले गया था और किसने जनमत संग्रह का आह्वान किया था? नेहरू-लियाकत समझौता क्या था और उसे कैबिनेट से पास कराए बिना लागू कैसे किया गया? यदि इन सवालों का तार्किक और विस्तृत जवाब चाहिए, तो डा. मुखर्जी की मौत की जांच कराई जानी चाहिए। अब भी राष्ट्रीय पुरातात्विक संग्रहालयों में बहुत कुछ उपलब्ध होगा। नए शोधार्थियों को शोध की स्वीकृति और मान्यता दें। उस ‘बलिदान’ को व्यर्थ नहीं जाने दिया जा सकता, क्योंकि उसकी जांच इतिहास का ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हो सकती है।

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