ब्यास में मिलता है फोजल नाला

मनाली से कुल्लू की ओर जाते हुए कटरोई से तीन किलोमीटर नीचे ‘फोजल नाला’ आता है जो डोभी के पास ब्यास  में मिलता है। सारे कुल्लु क्षेत्र में यह नाला  सबसे भयानक  है और इसने अनकों बार डोभी और दुआड़ा सहित अपने सारे क्षेत्र को बाढ़ से उजाड़ा है। इस नाले के पहाड़ की चोटी पर अंतिम गांव काथी कुकड़ी है…

गतांक से आगे …  

ब्यास वशिष्ट के ठीक सामने ब्यास  नदी के दाएं  किनारे पुरानी और  नई मनाली में सीमा बांधती हुई ‘मनालसु खड्ड’ बहती है। मनाली से कुल्लू की ओर जाते हुए कटरोई से तीन किलोमीटर नीचे ‘फोजल नाला’ आता है जो डोभी के पास ब्यास  में मिलता है। सारे कुल्लु क्षेत्र में यह नाला सबसे भयानक  है और इसने अनकों बार डोभी और टुआड़ा सहित अपने सारे क्षेत्र को बाढ़ से उजाड़ा है। इस नाले के पहाड़ को चोठी पर अंतिम गांव काथी कुकड़ी है और ब्यास के  संगम के साथ डोभी टुआड़ा । जब कभी फोजल नाले में बाढ़ में आती है तो सरवरी नदी और मंडी  जिला  के पंजौड़ नाले में भी भारी वर्षा होती है। कारण यह कि वे तीनों नाले एक ही पर्वत चेणी से निकलते है जिसे स्थानीय भाषा में सौरी जोत कहते हैं अर्थात सरों की पर्वत श्रृंखला। ब्यास के सहायक  नदी-नालों में पार्वती सबसे बड़ी नदी है। अनेक बार इसका पानी ब्यास से कहीं अधिक होता है। इसके किनारों पर जरी, करोल, मणिकर्ण, रुद्रनाग, खीरगंगा आदि। धार्मिक सांस्कृति, ऐतिहासिक स्थल स्थित है। ‘मानतलाई’ इसका स्रोत है। यह आसपास के लगभग 6300 मीटर ऊंचे हिमखंडित शिखरों से घिरा हुआ है। ‘डिबी-रा-नाला और तोश नाला इसके  सहायक नाले हैं। बजौरा से कुछ ही दूर  नीचे ब्यास  नदी के बाएं किनारे पर ‘गड़सानाला’ मिलती है। गड़सा  घाटी आज तक कुल्लू की सबसे पिछड़ी वादियों में से मानी जाती थी। पार्वती परियोजना ने इस घाटी और यहां के लोगों का भागय चमका दिया है। औट से चार किलोमीटर  आगे ब्यास  नदी के साथ कुल्लू जिला के सैंज और तीर्थन दो खड्डे मिलती हैं। और यहीं से ब्यास मंडी जिला में प्रवेश करती हैं। ब्यास नदी का ऊपरी भाग ‘ऊझी’ कहलाता है। यह आदि काल से बड़ा खुशहाल और संपन्न  क्षेत्र रहा है। नदी  के दोनों ओर विशाल-समतल खेत हैं, जो पुराने समय से लेकर धान उगाने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। यहां का जादू-धान बहुत लोकप्रिय खाद्य रहा है। इन्हीं उपजाऊ खेतों को बदौलत यहां  बड़े-बड़े गांवों में घनी आबादी रही है। ऊझी ही पहला क्षेत्र है जहां कुल्लु में आए विदेशी आबाद हुए हैं। कर्नल् रैनक ने सन् 1880 के आसपास नग्गर में ‘द हाल एस्टेट’ की स्थापना की जो अब ‘रौरिक संग्रहालय’ नाम से प्रसिद्ध है।                 

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