ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठित

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

थोड़ी देर पश्चात हंसते हुए लौटे तो उन्होंने कहा, जा मूर्ख मैं तेरी  बात नहीं सुनूंगा। मां ने मुझसे कहा है कि तू उसे साक्षात नारायण मानता है इसलिए उससे प्रेम करता है। जिस दिन उसके भीतर नारायण को न देख सकेगा, उसी दिन उसका मुंह भी  नहीं देखेगा। नरेंद्र एक बार श्री रामकृष्ण के भक्तों के बीच बैठे हुए थे। श्री राम कृष्ण ने प्रसंग क्रम में कहा, मेरे अपने अंदर जो शक्ति  है, वह ब्रह्म है और नरेंद्र के भीतर जो है वह पुरुष है, वह मेरी ससुराल है। इन बातों को सुनकर नरेंद्र धीरे-धीरे हंस पड़े। मन ही मन सोचा, फिर पागलपन शुरू हुआ।रामकृष्ण ने एक भेदी दृष्टि से नरेंद्र को देखा। बिना पलक झपकाए वह उसे देखते ही रहे, फिर एकाएक आसन से उठाकर उन्होंने अपना दाहिना चरण उनके स्कंध पर रखा। आगे का वर्णन कुछ नरेंद्र ने इस प्रकार किया है। श्री रामकृष्ण के स्पर्श से पलभर में मुझमें  एक अपूर्व अनुभूति उपस्थित हुई। मेरी आंखें खुली थीं, मैंने देखा दीवार सहित कक्ष की सारी वस्तुएं बड़े वेग से घूमती हुई न जाने कहां विलीन होती जा रही हैं और पूरे विश्व के साथ मेरा मैं पन भी मानो एक सर्वग्रासी माह शून्य में विलीन हो जाने के लिए तेजी से बढ़ता जा रहा है। मैं डर से विह्वल हो गया। मन में आया मैं पन का नाश ही मौत है। वही मौत सामने, बहुत पास आ पहुंची है। अपने को संभाल न पाने की वजह से मैं चिल्ला उठा। अजी आपने मेरा यह क्या कर डाला? मेरे तो माता-पिता भी हैं।  श्री रामकृष्ण नरेंद्र की हालत पर जोर-जोर से हंसने लगे। फिर उन्होंने नरेंद्र को छूते हुए कहा, तो रहने दे। एक ही बार में आवश्यक नहीं वक्त पर होगा। उनके द्वारा स्पर्श कर , ऐसा हिले मात्र से ही नरेंद्र स्वाभाविक हालत में आ गए। पल भर में ही यह घटना घट गई। नरेंद्र ने सोचा क्या इंद्रजाल है? उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि अब वो रामकृष्ण के हाथों की कठपुतली नहीं बनेंगे। फिर उन्होंने सोचा जो मनुष्य एक क्षण में उनके जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति संपन्न मनुष्य के मन को मिट्टी के ढेले की तरह तोड़ और गढ़ सकता है, वह कोई समान्य व्यक्ति नहीं। वे जरूर कोई शक्ति संपन्न मनुष्य हैं। वास्तव में नरेंद्र जिस ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठित होना चाहते थे, वही ब्रह्मज्ञान श्री रामकृष्ण ने उन्हें देना चाहा था, लेकिन तब माता-पिता की ममता में अंधे होकर नामरूप की सीमा को तोड़कर नरेंद्र योगियों के चिद्नंद  समुद्र में न कूद सके, तो श्री रामकृष्ण के ध्यान में आया कि अभी इसका वक्त नहीं आया है। इसलिए उन्होंने विचार बदल दिया। इस घटना के खत्म होने पर रामकृष्ण मानों संपूर्ण भिन्न व्यक्ति बन गए। वो अब नरेंद्र के स्वागत में जुट गए। विभिन्न प्रकट से नरेंद्र के सामने प्रेम प्रकट करते, इतने पर भी उन्हें शक्ति नहीं मिल रही थी।

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