भूत से डरें नहीं, वह तो बस भूत है

भूत-बाधाओं के वास्तविक स्वरूप को साधना चाहिए। साथ ही यह तथ्य भी हृदय में भली-भांति अंकित कर लेना चाहिए कि वास्तविक भूत-बाधाएं भी दुर्बल चित्त लोगों के सामने ही उपस्थित होती हैं। प्रेतात्माएं हर किसी के संपर्क में नहीं आतीं। वे दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को चुनौती देती हैं और उन्हीं को अपना वाहन बनाती हैं। मनस्वी लोग सदा जागरूक रहते हैं…

-गतांक से आगे…

भूत-बाधाओं के वास्तविक स्वरूप को साधना चाहिए। साथ ही यह तथ्य भी हृदय में भली-भांति अंकित कर लेना चाहिए कि वास्तविक भूत-बाधाएं भी दुर्बल चित्त लोगों के सामने ही उपस्थित होती हैं। प्रेतात्माएं हर किसी के संपर्क में नहीं आतीं। वे दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को चुनौती देती हैं और उन्हीं को अपना वाहन बनाती हैं। मनस्वी लोग सदा जागरूक रहते हैं। द्विजातीय तत्त्वों से लड़ने के लिए जिस प्रकार रक्त के श्वेत कण अपनी संघर्षशीलता का परिचय देते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रतिभा और प्रखरता के धनी अपनी साहसिकता के बल पर प्रेतात्माओं को समीप नहीं आने देते, आती है तो उन्हें धकेलकर दूर फेंक देते हैं। दुर्बल मनोभूमि के, अथवा प्रेतात्माओं में विशेष रुचि लेने वाले भूत भक्तों को उनका वाहन बनते देखा गया है। जिनके सिर पर आए दिन भूत झूमते रहते हैं, उन्हें अंग्रेजी में ‘मीडियम’ कहा जाता है। साधारणतया उन्हें प्रेत वाहन नाम दिया जाए तो अनुपयुक्त न होगा। प्रेतात्मा प्रमाणित व्यक्ति के भीतर से एक सूक्ष्म पदार्थ-प्रवाह निकलता है, जिसे टेलीप्लाज्म नाम दिया गया है। यह टेलीप्लाजम व्यक्ति-चित्त में विद्यमान उस अतीत के व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष (जिसे प्रेत कहते हैं) की छवि के संवेदनात्मक प्रतिबिंबों के अनुरूप आकार ग्रहण कर लेता है। यह माध्यम-व्यक्ति के शरीर से स्वयं को पृथक कर सकता है और इस प्रकार प्रेत की प्रतिच्छाया या छवि स्पष्ट दिखाई दे सकती है। डा. सीडी ब्रोड समेत अनेक वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिकों ने मीडियम (प्रेत प्रभावित व्यक्ति) के बारे में एक अन्य सिद्धांत प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि मस्तिष्क की संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोग का उत्पादन है, जिनमें एक अभौतिक तत्त्व भी सम्मिलित है, जिसे वे साइकिक फैक्टर कहते हैं। जब व्यक्ति मरता है, तो उसका शरीर रूपी यह संयोग बिखरकर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार उस शरीर में अवस्थित मस्तिष्क का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। किंतु साइकिक फैक्टर कोई भौतिक द्रव्य (मैटर) नहीं है, अतः वह विनष्ट नहीं हो सकता। यह अवशिष्ट साइकिक फैक्टर इधर-उधर भ्रमण करता रहता है। फिर ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही वह प्रविष्ट हो जाता है, जो इन परिव्राजक साइकिक फैक्टर्स के प्रति ग्रहणशील हो। ऐसे ही व्यक्ति मीडियम प्रेत वाहन बना करते हैं। साइकिक फैक्टर कोई व्यक्ति तो होते नहीं, वे पूरे मस्तिष्क के भी प्रतिनिधि नहीं होते।    

(यह अंश आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा रचित किताब ‘भूत कैसे होते हैं, क्या करते हैं’ से लिए गए हैं)

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