भूत से डरें नहीं, वह तो बस भूत है

साइकिक फैक्टर एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते। प्रेतात्मा के नाम पर घटित होने वाली अगणित घटनाओं में से प्रायः आधी ऐसी होती हैं, जिन्हें आवेशग्रस्त मस्तिष्कीय रोग की संज्ञा दी जा सकती है। उन्माद के, स्नायु दुर्बलता के, भीरुताजन्य, आत्महीनता के दबे असंतोष की प्रतिक्रिया के कितने ही कारण ऐसे होते हैं, जिनसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति गड़बड़ा जाती है…

-गतांक से आगे…

अपितु मस्तिष्क का पदार्थ से परे अंश विशेष होते हैं। अतः साइकिक फैक्टर एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते। प्रेतात्मा के नाम पर घटित होने वाली अगणित घटनाओं में से प्रायः आधी ऐसी होती हैं, जिन्हें आवेशग्रस्त मस्तिष्कीय रोग की संज्ञा दी जा सकती है। उन्माद के, स्नायु दुर्बलता के, भीरुताजन्य, आत्महीनता के दबे असंतोष की प्रतिक्रिया के कितने ही कारण ऐसे होते हैं, जिनसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति गड़बड़ा जाती है। उस स्थिति में शरीरगत और मनोगत तनाव बढ़ता है। वह एक प्रकार के कंपन, रोमांच, ज्वर एवं आवेश जैसा होता है। ऐसा विचित्र रोग पहले अनुभव में नहीं आया था। अस्तु उसकी सीधी तुक प्रेत आक्रमण से लगा ली जाती है। रोगी के मन में यही मान्यता दृढ़ होती है और दर्शकों, संबंधियों में से अधिकांश प्रेत उपचार के सरंजाम इकट्ठे करके, रोगी की भ्रमग्रस्तता को पूरी तरह परिपुष्ट कर देते हैं। आम तौर से प्रेत आक्रमण इसी स्तर के होते हैं। संस्कार-जगत में प्रेतात्माओं का आतंक अंकित रहा, तो आवेशग्रस्त, रुग्ण व्यक्ति अपनी स्थिति की संगति भूत-प्रेतों, देवी-देवताओं के आक्रमण के साथ बैठाकर, उसी प्रवाह में स्वयं को बहाने लगता है। इससे ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं, मानो सचमुच ही कोई भूत-वेताल उस व्यक्ति को दबोच बैठा हो। वस्तुतः यह ऐेंक्जाइटी न्यूरोसिस तथा हिस्टरिक न्यूरोसिस की स्थिति होती है। हैवीफ्रेनिया की स्थिति भी ऐसी ही रुग्ण मनोदशा का परिणाम है। अपने इष्ट देवों का दर्शन करने वाले अनेक भक्त जन भी इसी मनोस्थिति में विभिन्न कौतूहलपूर्वक दृश्य देखा करते हैं। जिनके प्रियजन हाल ही में और असमय में मरे हों, उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा आकर बात करती दिखाई पड़ती है। ये सब मानसिक अस्त-व्यस्तता के ही परिणाम। सुनिश्चित-सुनियोजित महत्त्वाकांक्षाएं व्यक्तित्व को ओजस्वी, गतिशील, प्रखर और प्रभावी बनाती हैं, तो आकश-कुसुमवत आकांक्षाओं का अनपेक्षित विस्तार व्यक्तित्व को विभाजित कर देता है। विभाजित व्यक्तित्व मानसिक रोगों का सुरक्षित घर बनता जाता है। व्यक्तित्व का यह विभाजन अनेक बार प्रेत-बाधाओं के रूप में भी सामने आता है। जब आकांक्षाएं शक्ति से सर्वथा विलग और विसंगत हो जाती है, तब से स्वाभाविक न रहकर अस्वाभाविक हो जाती है, उनकी पूर्ति संभव न होने से उनका दमन करना पड़ता है। दमित आकांक्षाएं पाप-पिशाच का रूप लेती जाती हैं।                     

(यह अंश आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा रचित किताब ‘भूत कैसे होते हैं, क्या करते हैं’ से लिए गए हैं)

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