भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक

आयकर विभाग के 12 आला अफसरों को जबरन सेवानिवृत्त किया गया है। यह कार्रवाई नियम 56 के तहत की गई है। इनमें चीफ कमिश्नर और प्रिंसिपल कमिश्नर स्तर के अफसर थे। उन पर सामान्य भ्रष्टाचार, अवैध संपत्ति, कारोबारी से दबाव डाल कर धन उगाही, घूस और महिला सहयोगियों के यौन उत्पीड़न तक के आरोप थे। एक ऐसा अफसर भी था, जिसने अपने और परिजनों के नाम करीब 3.25 करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित कर रखी थी, जबकि उसकी आय के सभी ज्ञात स्रोतों से इतनी संपत्ति बनाना असंभव था। यह भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसा प्रहार है। कदाचित इससे पहले हमने किसी भी प्रधानमंत्री को इतनी व्यापक और कड़ी कार्रवाई करते नहीं देखा। ये कोई एक दिन, महीना या साल भर के मामले नहीं है। हमारी व्यवस्था ऐसे ‘भ्रष्टों’ को ढोती आ रही थी। एक आयकर आयुक्त पर आय से ज्यादा संपत्ति के आरोप थे। उसे करीब 10 साल पहले निलंबित किया गया था और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस दर्ज किया गया था। केस आज भी जारी है। यह मामला ही स्पष्ट कर देता है कि भ्रष्टाचार से निपटने के कानून और हमारी व्यवस्था में कितने छिद्र हैं। बहरहाल भ्रष्टाचार पर अभी तो प्रक्रिया शुरू हुई है। न जाने कितने दागी और भ्रष्ट सरकारी अफसरों की नौकरी पर गाज गिरेगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम 2014 से ही मोदी सरकार का बुनियादी सरोकार रहा है। सचिव स्तर के अधिकारियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बिलकुल स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार किसी भी सूरत में किसी भी आधार और स्तर पर बर्दाश्त नहीं होगा। अलबत्ता अधिकारी खुद को ही ‘पीएम’ समझें और आगामी पांच सालों का एजेंडा तैयार करें। सार्वजनिक जिंदगी से एक उदाहरण दिया प्रधानमंत्री ने। ऊबर कैब के आने से आम आदमी सार्वजनिक परिवहन पर ही पूरी तरह आश्रित नहीं रहा है, उसकी जिंदगी आसान हुई है। इसी तरह आम आदमी ने डाक और तार विभाग के विकल्प के तौर पर मोबाइल को चुना है। संचार और संवाद के सुगम होने से उसकी जिंदगी मोबाइल ने भी आसान की है। प्रधानमंत्री के उदाहरणों का आशय था कि सरकार और प्रशासन के कार्यों और फैसलों से देश के आम आदमी की जिंदगी आसान होनी चाहिए। भ्रष्टाचार इसमें बहुत बड़ा व्यवधान है, लिहाजा मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी भ्रष्टाचार पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से शुरू की है। अपने बीते कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 3 लाख फर्जी कंपनियों पर ढक्कन लगवाए थे। बेनामी संपत्ति और भगौड़ा आर्थिक अपराधी कानून बनाए। करीब 1.25 लाख संदिग्धों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांचात्मक कार्रवाई की जा रही है। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि ज्यादातर संदिग्धों को जेल की हवा खानी ही पड़ेगी। बैंकों में भ्रष्ट लेन-देन की भी जांच जारी है। संपत्ति की खरीद-बेच में नकदी की सीमा तय कर दी गई है। अब काला-सफेद की गुंजाइश बहुत कम रह गई है। बेशक सरकारी गलियारों और मंत्रालयों में भ्रष्टाचार बहुत सीमित हो गया है, दलालों की सक्रियता बेहद कम हो गई है, लेकिन कोशिशें अब भी जारी हैं। काम कराने की कोशिश की आड़ में दलाल अब भी ‘माल’ कमा रहे हैं, लेकिन उन्हें या तो दिल्ली छोड़ कर भागना पड़ता है अथवा उनकी जगह जेल में है। जहां सरकार का अंकुश नहीं है, निजी क्षेत्र की उन कथित फर्जी कंपनियों में साक्षात्कार के नाम पर ‘लूट’ अब भी जारी है। मोदी सरकार को एक-दो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ वहां भी करनी पड़ेंगी। दरअसल आम जनता की अपेक्षा यह है कि अंततः भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन, सरकार ही होनी चाहिए। 12 अफसरों की नौकरी से ‘छुट्टी’ और जबरन सेवानिवृत्ति वाकई एक क्रांतिकारी और सराहनीय कदम है। यह शुरुआत भर है, जबकि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारे मानस और समाज में बेहद गहरे फैली हैं। इन मामलों ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन को भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न से मुक्त करना कितना जटिल और मुश्किल काम है। प्रधानमंत्री से ही उम्मीदें हैं, क्योंकि केंद्र सरकार ने यह करने की शुरुआत की है।

You might also like