मनुष्य में संवेदनशीलता का भाव

आशुतोष आशु

गुलेर, देहरा गोपीपुर

वेद शब्द का अर्थ होता है जानना। ज्ञान न हो पाने की टीस, वेदना में परिवर्तित हो जाती है। आचार्य सांख्य ने कहा था- त्रिविध दुखों के अभिघात स्वरूप जिज्ञासा उत्पन्न होती है। महर्षि के तीन दुख सत्व, रज और तम तक सीमित थे। आम आदमी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान ही तीन दुख हैं। जब इन तीन दुखों की प्राप्ति अपनी इच्छानुरूप न हो, तो मनुष्य का अपना ही ज्ञान वेदना में परिवर्तित हो जाता है। वह दुनिया के समस्त प्रपंच कर देना चाहता है कि कुछ तो हासिल हो, परंतु जान नहीं पाता कि हासिल करना क्या है? चूंकि इच्छाएं उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती हैं, इसलिए एक इच्छा की पूर्ति पर वही चाह दूसरे के मुकाबले छोटी लगती है। यदि आप अपने अंदर टटोल कर देखने के उत्सुक हो, तो यथार्थ दर्शन की प्रबल संभावना है। अन्यथा कुछ न समझ पाना भी वेदना का एक स्वरूप है। बहरहाल संवेदना थोड़ी इतर है। संवेदना अनुभव का विषय है, संवेदना जताना व्यक्ति विशेष में निहित नाटकीय कौशल का प्रस्तुतीकरण है। कभी-कभार संवेदना जताने से आप संवेदी कहे जा सकते हैं, यह मात्र इंद्रियजनित प्रेरणा है। इन सबसे अलग, संवेदनशीलता व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होती है। संवेदी होकर संवेदना जताने और संवेदनशील होने में दिन-रात का अंतर है।  संवेदनशील होना किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है। कतिपय ज्ञानी लोग संवेदनशील हुए बिना भी संसार में प्रसिद्ध हो सकते हैं। रावण संवेदनशील नहीं था, परंतु ज्ञान के आलोक में कभी पौरुष का मिथ्या प्रदर्शन भी नहीं किया। संवेदनशीलता कोई विशेष योग्यता नहीं, परंतु संवेदी होने का जामा ओढ़कर घूमना रंगा सियार होकर घूमने जैसा घातक है। जो जैसा है, उसी स्वरूप में उसे स्वीकार करने की अभूतपूर्व शक्ति इस संसार में है। कैक्टस और आम दोनों ही सृष्टि में स्वीकार्य हैं, दोनों की अपनी उपादेयता है। इसलिए आप जो हैं, वही रहें। छद्म क्षणिक हो सकता है, परंतु चरित्र नहीं बदला जा सकता। छद्मावरण को बनाए रखने के लिए अनेक तर्क देने पड़ेंगे। आपकी एकरूपता ही आपको विश्वसनीय बनाएगी, अन्यथा सदैव किसी अनर्थ की कुशंका से पीडि़त रह सकते हैं।  रामकृष्ण परमहंस ने कहा था- ‘विश्वास तो होता ही अंधा है। ऐसा कोई विश्वास नहीं, जिसे आंख देख सके। विश्वास से ज्ञान बढ़ता है और जहां तर्क बढ़ जाता है- वहां अहंकार रह जाता है।’

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