मन का निर्मल होना

Jun 15th, 2019 12:05 am

बाबा हरदेव

अब मन कितना ही शुद्ध किया जाए ये मन ही रहेगा। जैसे जहर को शुद्ध नहीं करना होगा, क्योंकि जहर जितना शुद्ध हो जाएगा ये जहर ही रहेगा और ये जहर और खतरनाक हो जाएगा चूंकि मन का स्वभाव असाध्य है, ये किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता। मन इतना कुशल है, इतना चालाक है और इसका गणित इतना जटिल है कि मनुष्य एक से हटे कि मन तत्क्षण मनुष्य के लिए दूसरा जाल बिछा देता है। अतः जो लोग अज्ञानता का शिकार है, वही मन के उत्पातों से डरते हैं, मन को मार देने की बातें करते हैं। सत्य के ज्ञाता मन को मारने की नहीं, बल्कि मन को मोड़ने की बात करते हैं। इनका मत है कि दिशा बदलने से दशा अपने अपने आप ही बदल जाती है। संपूर्ण अवतार बाणी का भी फरमान है।

होर जतन ने सारे झूठे, झूठे ने सब होर उपा मोड़ के

मन नूं दुनियां वल्लों चित गुरु दी चरणी ला।

अतः जब भी चेतना ‘द्रष्टा’ को भूल जाती है, ‘साक्षी’ को भूल जाती है, तभी तरंगित होकर उपाधिग्रस्त हो जाती है। चेतना पर बंधी इस ग्रंथि ‘मन’ को हम अकसर सुलझाना चाहते हैं, यानी ‘मन’ से ‘मन’ को सुलझाने की कोशिश करते हैं और यहां भूल हो जाती है, क्योंकि मन स्वयं एक उलझाव है। मन से कोई सुलझाव हल नहीं हो सकता, जैसे कोई अपने ही हाथ से उसी हाथ को पकड़ने की कोशिश करता है या जैसे कोई चश्मा लगाकर उसी चश्मे को खोजता फिरे कि कहां है चश्मा? अतः महात्मा फरमाते हैं कि साक्षी को बिना जगाए ये मन रूपी ग्रंथि कभी नहीं सुलझ सकती। मानो हमें द्रष्टा को इस ग्रंथि के भीतर लाना होगा, ताकि से ग्रंथि आसानी से टूट सके और ये कला पूर्ण सद्गुरु ही हरिनाम रूपी दात देकर प्रदान कर सकता है।

मनु परबोधहु हरि कैं नाई!

दह-दिसि धावत आवै ठाइ।।

अंत में कहना पड़ेगा कि मन को ईश्वरोन्मुख करने की देर है, फिर ईश्वर के साम्राज्य की जानकारी प्राप्त करते ही, मन की चंचलता इसकी उछल-कूद मनुष्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। श्रीमद्भगद्गीता में भी जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे कृष्ण! मन निश्चय ही चलायमान है, इंद्रियों को चंचल बनाने वाला है, बलवान तथा दृढ़ है, मैं इसको वश में करना वायु के समान कठिन मानता हूं तो श्रीकृष्ण ने कहा-

असंशय महाबाहो! मनो दुर्निग्रहं चलम।

अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते।

अर्थात हे विशाल भुजाओं वाले अर्जुन! हे कुंती पुत्र! निस्संदेह मन कठिनता से वश में होने वाला एवं चंचल है यह तो अभ्यास (भगवद-स्मरण) और वैराग्य से पकड़ा जाता है। सच बात तो यह है कि असीम सत्ता मन से परे की बात है, इसलिए पूर्ण सद्गुरु की कृपा द्वारा मन की मति से बहुत ऊपर उठ जाना होगा। तभी हमारी समझ में इस असीम की बात बैठ सकेगी।  मानो मन को मुक्त नहीं करना होगा, बल्कि मन से मुक्त होना है, क्योंकि ‘मन’ से मुक्त होना ही मुक्ति है। मन का निर्मल हो जाना, ‘मन के पार’ चले जाना है। संपूर्ण अवतार बाणी का भी फरमान है।

एह मन कदे नहीं निर्मल होणा बाझ गुरु दे कहे अवतार

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