मिड-डे मील की जांच को बजट नहीं

शिमला—स्कूलों में मिड-डे मील की क्वालिटी जांचने के लिए इस बार भी केंद्र सरकार से कोई मदद नहीं मिली है। दरअसल शिक्षा विभाग अलग से सरकारी स्कूलों में दो लाख से ज्यादा बच्चों को मिलने वाले खाने की क्वालिटी जांचने के लिए अलग से टेस्ंिटग मशीन लेना चाहता था। इसके लिए भारत सरकार से बजट की दरकरार थी, लेकिन विभाग को निराशा ही हाथ लगी है। भारत सरकार ने साफ कहा है कि राज्य सरकार को मिड-डे मिल के लिए आगे सारा खर्च खुद ही उठाना होगा। फूड टेस्टिंग करने के लिए राज्य सरकार को स्वयं बजट खर्च कर विकल्प के रास्ते तलाशने होंगे। अहम यह है कि शिक्षा विभाग ने जिन चार से पांच निजी विश्वविद्यालय को फूड की क्वालिटी जांचने के लिए सर्वे करने का जिम्मा दिया था, उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। हिमाचल की कई बड़ी यूनिवर्सिटी ने बजट न होने की बात कर सर्वे न करने का फैसला लिया है। हैरानी है कि प्रदेश में एक साल में केवल दस स्कूलों के मिड-डे मील के खाने को जांचा जाता है। सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील के खाने की जांच के लिए मोहाली की टेस्टिंग लैब में भेजना पड़ता है। जानकारी के अनुसार मोहाली की टेस्टिंग लैब से खाने की क्वालिटी रिपोर्ट आने में भी दो और तीन महीने लग जाते है। इसी के चलते शिक्षा विभाग ने मिड-डे मील को जांचने के लिए टेस्टिंग लैब की मांग उठाई थी, लेकिन भारत सरकार ने इस पर बजट देने पर इनकार कर दिया है। इससे विभाग की दिक्कतें और बढ़ गई हैं। शिक्षा अधिकारियों के मुताबिक इस बजट को मिड-डे मील में गुणवत्ता लाने के लिए खर्च किया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार प्रदेश में जब से मिड-डे मील योजना शुरू हुई है, तब से लेकर अभी तक केवल ऊना और सोलन जिला के 10-10 स्कूलों में मिड-डे मील के खाने की जांच हो पाई है।

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