मुस्लिम ही ‘अल्पसंख्यक’

मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय है। 2006 से पहले यह मंत्रालय नहीं होता था। मौजूदा सरकार ने अल्पसंख्यकों की शिक्षा, रोजगार, सशक्तिकरण के जरिए विकास की योजना तैयार की है। हमने बीते दिनों विश्लेषण किया था कि अब प्रधानमंत्री मोदी ‘भाईजान’ क्यों बनना चाहते हैं। तभी जिक्र किया था कि अल्पसंख्यक नौजवानों को पांच साल के दौरान पांच करोड़ वजीफे दिए जाएंगे और 25 लाख नौजवानों को रोजगार के लिए कौशल प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। ऐसी कई योजनाएं हैं, जिनका फोकस सिर्फ अल्पसंख्यक जमात पर है, लेकिन सरकार की घोषणा के बाद बहस मदरसों के आधुनिकीकरण पर ही केंद्रित हो गई है। एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कम्प्यूटर की ही चर्चा जारी है। क्या अल्पसंख्यक मुसलमान ही हैं। बीते दिनों वाराणसी की ‘अखिल भारतीय संत समिति’ के संतों ने प्रधानमंत्री मोदी को एक पत्र लिखकर मांग की कि सात राज्यों और एक संघशासित क्षेत्र में हिंदू ‘अल्पसंख्यक’ हैं, लिहाजा मोदी सरकार उन्हें यह दर्जा दे और उसी के मुताबिक सुविधाओं का दायरा बढ़ाए। इनमें संघशासित लक्षद्वीप के अलावा पंजाब, जम्मू-कश्मीर, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम राज्य भी शामिल हैं। बहरहाल वह मुद्दा भिन्न है, लेकिन आज तक ‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा तक तय नहीं की गई है। बेशक अल्पसंख्यक समुदायों में मुसलमान सबसे बड़े बहुसंख्यक हैं, लेकिन खुद भारत सरकार ने अल्पसंख्यक के तौर पर सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों को भी सूचीबद्ध कर रखा है। सवाल है कि नई अल्पसंख्यक नीति में दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए विद्यालय, रोजगार के केंद्र, धर्मग्रंथों की चर्चा, हुनर हाट आदि का जिक्र क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री मोदी बार-बार ‘अल्पसंख्यक’ शब्द इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ‘मुसलमान’ और ‘मदरसा’ शब्दों को दोहरा रहे हैं। यह विरोधाभास और भ्रम क्यों है? यदि नीतियां और योजनाएं सिर्फ मुसलमानों के लिए ही तय की गई हैं, तो ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है? क्या जैन, बौद्ध सरीखे बेहद अल्पसंख्यक समुदाय मोदी सरकार की प्राथमिकताओं से बाहर हैं, क्योंकि उनकी आबादी क्रमशः 0.37 फीसदी और 0.72 फीसदी है? हालांकि देश के संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 350 और 350-बी में ‘अल्पसंख्यक’ का उल्लेख जरूर है। अनुच्छेद 20 और 30 में भी इसका जिक्र है, लेकिन ‘अल्पसंख्यक’ कहीं भी परिभाषित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यदि 3-5 फीसदी कोई भिन्न आबादी है, तो वह ‘अल्पसंख्यक’ है। अब उसे राज्य सरकारें अल्पसंख्यक का दर्जा और दायरा दें अथवा केंद्र सरकार उनके कल्याण और विकास की नीतियां तय करे, यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन अल्पसंख्यकों को सुविधाएं दी जानी हैं। बेशक भारत में 14 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी सियासी और चुनावी दृष्टि से बेहद संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण है। इस आबादी के 8-10 फीसदी वोट आम चुनाव में मोदी-भाजपा को पड़े हैं। अब मोदी मुसलमानों का दिल जीतना चाहते हैं और मुसलमानों को भी देश के प्रधानमंत्री अच्छे लग रहे हैं, लेकिन एक शक भी है, जिसे आजम खान सरीखे मुस्लिम नेता गहरा देते हैं। शक के कारण सवाल उठाया जा रहा है कि जिन्होंने गोधरा का कत्लेआम कराया, जिस पार्टी में गोडसे और साध्वी प्रज्ञा से लेकर साक्षी महाराज और गिरिराज सरीखे तत्त्वों ने हरेक मुसलमान में ‘आतंकी’ की छवि देखी और मदरसों को आतंकवाद और अतिवाद के अड्डे करार दिए, अब वे तरक्की और विकास की बात क्यों करने लगे हैं?  यकीन नहीं होता। पहले जमीनी स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी कुछ करके दिखाएं, मुसलमानों का दिल जीतें, तब उन पर यकीन किया जाएगा। निष्कर्ष यह है कि पूरी बहस और चर्चा मुसलमान को लेकर है। पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक ‘अल्पसंख्यकों’ का है। कौन-से अल्पसंख्यक…? प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा का मानना होगा कि सिख, जैन, बौद्ध की बहुसंख्यक जमात तो उनकी समर्थक है और वोट भी देती रही है। पारसी और ईसाई भी भाजपा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। बुनियादी मुद्दा मुसलमानों का है, जिनके और मोदी-भाजपा के दरमियान फासले बड़े गहरे रहे हैं। अब उन्हें जीतने की सियासत शुरू हुई है। बेशक मुसलमानों की पढ़ाई, पिछड़ेपन और विकास की भी चिंता की जा रही है, लेकिन उसकी बुनियाद में मुसलमानों के वोट और उनका धु्रवीकरण भी है। तो अब से मान लेना चाहिए कि ‘अल्पसंख्यक’ के मायने सिर्फ मुसलमान ही हैं।

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