मूल्यविहीन शिक्षा बनाम निरक्षरता

Jun 8th, 2019 12:06 am

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

अतः समय रहते हमें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी शिक्षा के पाठ्यक्रमों, उनके निर्धारित उद्देश्यों, विषयवस्तु के साथ-साथ नर्सरी से ही मूल्याधारित शिक्षा, जिसमें राष्ट्रभक्ति, त्याग, समर्पण, सहानुभूति, दया, करुणा के साथ-साथ ईमानदारी और मानवीय मूल्यों के बीजारोपण वाली शिक्षा आरंभ करनी होगी…

भारत में प्राचीनकाल से ज्ञानार्जन का एकमात्र विकल्प प्रकृति के समीप वनों में स्थित ऋषि-मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। राजा भी और रंक भी अपने बच्चों को शिक्षार्थ अथवा ज्ञानार्जन के उद्देश्य से इन्हीं आश्रमों में भेजा करते थे। सतयुग, त्रेता, द्वापर में हुए तमाम राजा-महाराजाओं को भी नकारात्मक ऊर्जा का सामना करना पड़ा। तभी भगवान श्रीकृष्ण को साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर चलते हुए दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को दंडित करवाने के लिए अपने वचन के विरुद्ध विपरीत जाना पड़ा, परंतु उस काल तक फिर थोड़ा नकारात्मक प्रभाव कम था। यही कारण था कि मां सीता का हरण करने के बावजूद चार वेदों के ज्ञाता रावण में इतनी नैतिकता तो मौजूद थी कि उसने मां सीता को अपनी कैद में रखकर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें छूने की कोशिश नहीं की।

पहले तीन युगों से निकल कर जब समाज ने चौथे युग, जिसे कलियुग के नाम से आज हम जानते हैं, में प्रवेश किया तो हमारे जीवन मूल्यों में समय के व्यतीत होने के साथ-साथ पतन, गिरावट आती चली गई। इस सारी गिरावट का कारण बनी आचारहीन, आदर्शहीन, नैतिकता विहीन हमारी शिक्षा। समाज हर युग में एक ओर स्थायी तो दूसरी ओर संक्रमण काल से गुजरता है। प्राचीन, पौराणिक काल में आश्रमों की संख्या कम होती थी, लेकिन प्रत्येक मानव का व्यक्तिगत चरित्र बहुत ऊंचा और अनुकरणीय हुआ करता था, लेकिन युग परिवर्तन के साथ-साथ हमारी प्राथमिकताएं, दृष्टिकोण, जरूरतें बदलीं और आश्रमों का स्थान धीरे-धीरे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने ले लिया। कई बार यह देखने को मिलता है कि हम कहां से चले और तरक्की के नाम पर कहां पहुंच गए हैं और आगे हमारा अंतिम पड़ाव कहां होगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य हमें एक संपूर्ण मानव बनाना है, ताकि हम शिक्षा प्राप्ति के पश्चात स्वयं और एक हैवान या पशु में अंतर समझ सकें। अतः शिक्षा वह विशेष ज्ञान है, जो केवल मनुष्य को ही प्राप्त है। इस विशेष गुण की प्राप्ति के पश्चात भी यदि हमारे और पशुओं के व्यवहार में खास अंतर नहीं आता, तो हमारी प्राप्त की गई तमाम शिक्षा व्यर्थ हो जाती है और आज संसार में वही देखने को मिल रहा है। आज समाज-मनुष्य बाह्य तौर पर तो बहुत ही सुसंस्कृत, शिक्षित प्रतीत होता है, परंतु जब उसके भीतर विद्यमान जीवन मूल्यों का आकलन होता है, तब पढ़े-लिखे व्यक्तियों की तुलना में अनपढ़, अशिक्षित लोग बहुत ऊंचे मूल्यों के स्वामी देखने को मिलते हैं। तब प्रश्न उठता है कि विश्वभर में इतने अधिक संख्या में उपलब्ध शिक्षा संस्थानों और उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्ति के बाद आज मनुष्य उसी शिक्षा को एक हेराफेरी कानून विरोधी कार्य करने का औजार बनाकर सबसे ज्यादा समाज, राष्ट्र, प्रकृति को निहित स्वार्थ के लिए लूटने का प्रयास करता नजर आता है। इस लोभ, लालच, रातोंरात अमीर बनने के स्वप्न के कारण स्वर्ग भोगता हुआ मुनष्य अपने नीच कर्मों के कारण नरक में पहुंच जाता है। उसकी तालीम में गहराई से यदि आकलन करें, तो मालूम पड़ेगा कि शिक्षा तो ली, लेकिन वह मूल्यविहीन शिक्षा थी। इसलिए एक उच्चकोटि के विद्यालय में पढ़कर भी पाश्विक मनोवृत्ति का रोगी बन गया। एक अच्छा पढ़ा-लिखा मंत्री पद पर बैठा व्यक्ति अपनी सत्ता और शिक्षा का दुरुपयोग कर लाखों, करोड़ों का धन हड़पने के आरोप में जेल में पहुंच जाता है। एक उच्च शिक्षा प्राप्त डाक्टर लोगों के अंग-प्रत्यंग बेचकर धन के लोभ में इतना गिर जाता है कि उसे मालूम ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है।

लाखों रुपए का वेतन लेने वाला सेना अधिकारी केवल लालच के चलते देश के राज दुश्मन को बेचता पकड़ा जाता है। एक अच्छे पद पर बैठा अधिकारी सरेआम रिश्वत लेता पकड़ा जाता है, तो शिक्षा में जीवन मूल्यों का अभाव, नैतिकता, धार्मिक शिक्षा का नदारद होना, शीर्ष पदों पर आसीन राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक नेताओं के द्वारा अनाचार को बढ़ावा देना और आदर्श या रोल मॉडल न बन कर गलत आचरण करना ही आज हमारे जीवन व मानवीय मूल्यों में गिरावट का कारण है। तुलनात्मक रूप में अशिक्षित लोग आज भी धर्म व भगवान के दंड से डर कर कोई गलत कार्य नहीं करते, जबकि शिक्षित जब नियमों को ताक पर रखकर आगे बढ़ रहा है, तो यह बड़ी चिंता का विषय है।

अतः समय रहते हमें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी शिक्षा के पाठ्यक्रमों, उनके निर्धारित उद्देश्यों, विषयवस्तु के साथ-साथ नर्सरी से ही मूल्याधारित शिक्षा, जिसमें राष्ट्रभक्ति, त्याग, समर्पण, सहानुभूति, दया, करुणा के साथ-साथ ईमानदारी और मानवीय मूल्यों के बीजारोपण वाली शिक्षा आरंभ करनी होगी तथा गलत इतिहास को निकाल बाहर करना होगा। राष्ट्रद्रोह और बोलने की आजादी इत्यादि पुनर्परिभाषित करने होंगे, वरना देश को तोड़ने के नारे हमारे विश्वविद्यालयों से रोज लगते रहेंगे। नकारात्मक भाव और संदेश देने वाले समाचारों को सोशल मीडिया पर महिमामंडित  करना भी समाज के हित में नहीं है। किसी आतंकवादी को एक हीरो बनाकर पेश करना दस और आतंकवादी बनने को प्रेरित करेगा।

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