मृत्युंजय जप कैसे करें

अनंत कोटि ब्राह्मंडात्मक प्रपंच की अधिष्ठान भूता सचिदानंद स्वरूपा भगवती श्री दुर्गा ही संपूर्ण विश्व को सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। ये मायावी विश्व उन्हीं से शुरू होकर उन्हीं में लीन हो जाता है। जैसे दर्पण में देखने पर पूरा कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, वैसे ही मां भगवती दुर्गा, जगतजननी में संपूर्ण विश्व आसित होता है। दर्पण के उपलब्ध में ही प्रतिबिंब का उपलम्भ होता है, वैसे ही अखंड, नित्य, निर्विकार महाचिट में ही उसके अस्तित्व में ही प्रभाता प्रमाण प्रेमेयादि उपलब्ध होता है…

-गतांक से आगे…

जिस स्त्री का पुत्र उत्पन्न होकर मर जाता हो और सर्वथा संतान से दुखित रहती हो, यदि वह स्त्री इस यंत्र राज को सांगोपांग धारण करे तो उसकी संतान जिए और उसे संततिसुख प्राप्त हो।   दो दीर्घ रेखा खींच उनमें अष्टदल कमल बनाकर रेखाओं के मध्य में ‘ओं हीं देवदत्त हीं ओं’ इस मंत्र को लिखें। रेखा कै गात्र दल में ओं हूं, रेखा के अंत दल में ओं इन बीजों के लिखें। हे परमेश्वरि, गोरोचन, कुमकुम, लाख इनसे साध्य व्यक्ति के नाम को लिखकर पंचामृत में स्नान कराएं। हे देवेशि, स्त्री अवश्य जीवत्सा हो, हे शिवू, इस यंत्र को धारण करने वाली स्त्री का पुत्र कदापि अकाल मृत्यु को प्राप्त न होगा। परंतु उक्त विधि के अनुसार पूजन कर और एक लाख मंत्र जप करना आवश्यक है।

दस महाविद्याओं की शक्तियों का स्वरूप

अनंत कोटि ब्राह्मंडात्मक प्रपंच की अधिष्ठान भूता सचिदानंद स्वरूपा भगवती श्री दुर्गा ही संपूर्ण विश्व को सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। ये मायावी विश्व उन्हीं से शुरू होकर उन्हीं में लीन हो जाता है। जैसे दर्पण में देखने पर पूरा कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, वैसे ही मां भगवती दुर्गा, जगतजननी में संपूर्ण विश्व आसित होता है। दर्पण के उपलब्ध में ही प्रतिबिंब का उपलम्भ होता है, वैसे ही अखंड, नित्य, निर्विकार महाचिट में ही उसके अस्तित्व में ही प्रभाता प्रमाण प्रेमेयादि उपलब्ध होता है।  अधिष्ठान न होने पर भास्य के उपलम्भ की आशा नहीं की जा सकती है। यद्यपि शुद्ध ब्रह्म स्त्री, पुमान् या नपुंसक में से कुछ नहीं है, तथापि वह चिति, भगवती, दुर्गा आदि स्त्री-वाचक शब्दों से आत्मा, पुरुष आदि पुम्बोधक शब्दों से और ब्रह्म, ज्ञान आदि नपुंसक-शब्दों से भी व्यवहृत होता है। वस्तुतः स्त्री, पुमान्, नपुंसक-इन सबसे पृथक होने पर भी उस शरीर के संबंध से या वस्तु के संबंध से वही अचित्य, अव्यक्त, स्वप्रकाश, सच्चिदानंद स्वरूपा महाचिति भगवति दुर्गा, आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दों से व्यवहृता होती है। मायाशक्ति का आश्रयणकर वह ही अनेक रूपों में व्यक्त होता है। कोई इस परमात्मारूपा महाशक्ति को निर्गुण कहते हैं और कोई सगुण। ये दोनों बातें भी ठीक हैं, क्योंकि उन एक के ही तो ये दो नाम हैं।                                                        

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