मैं शिमला लूटने नहीं, सलामी देने आया हूं

शिमला—मैं ठाकुर गब्बर सिंह शिमला को लूटने नहीं, बल्कि सलामी देने आया हूं और तुम घबराओ नहीं हम तुम्हें लूटेंगे नहीं, बल्कि जो तुम्हें चाहिए वो लेकर देंगे। जी हां ये शब्द राजस्थान के उस कलाकार के हैं, जिन्होंने अपने राजा महाराजा के समय की संस्कृति को देश व विदशों में जीवित रखा है। शिमला के अंतरराष्ट्रीय ग्रीष्मोत्सव में राजस्थान से आए महबूब ने कहा कि उनका परिवार रजवाड़ों के समय से बहरूपिए  की कला को देश भर मेंे दिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह कई सालों से डाकू गब्बर सिंह का रोल निभा रहे हैं। ‘दिव्य हिमाचल’ से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए महबूब ने बताया कि अब लोग डाकू गब्बर सिंह राजस्थान की इस परंपरा को केवल चित्रों के माध्यम से ही देख पाते हैं। इससे उन्हें कई असली चीजें पता नहीं लग पाती। दिलचस्प यह है कि राजस्थान में रजवाड़े की एक ही ऐसी फेमिली बची है जो अभी भी अपने बेहरूपिए की इस कला को संजोए रखे हैं। राजस्थान में महबूब का गब्बर सिंह का किरदार देश विदेशों में काफी मशहूर है। सोमवार को जब मालरोड पर ठाकुर गब्बर सिंह की आवाज गूंजी तो एकाएक  मॉल पर घूम रहे लोगों की भीड़ उन्हें देखने के लिए जुट गई। राजस्थान से आई बहरूपिए के परिवार को देखकर लोग भी हैरान रह गए। माल रोड पर बंदर, हनुमान, शिव, जोकर के बनाए बहरूपिए के साथ लोगों ने बहुत सारी फोटो खिंचवाईं।

तेलंगाना नृत्य भी रहा आकर्षण का केंद्र

शिमला में सोमवार को आयोजित किए गए अंतरराष्ट्रीय समर फेस्टिवल में तेलगांना का नृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहा। इस नृत्य के माध्यम से डांस कलाकारों ने मथुरा में कृष्ण की रास लीलाओं का खूब बखान किया। जइयों-जइयों रे लॉन्ग मोरे सावन की बोद्धा मेरे रींगुन-रोंगा के  गाने से कृष्ण की लीलाओं का खूब बखान किया।

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