मौत का बुखार

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के सामने बुखार से तपती और तड़पती पांच साल की बच्ची की मौत हो गई। मंत्री और साथ में मौजूद अफसर स्तब्ध रह गए। चीत्कार मच गया। हास्यास्पद् है कि उसे चुप कराने की बेजा कोशिशें की गईं। यह बिहार में बच्चों के स्वास्थ्य का नंगा सच है। यह सच बीते कई सालों से लगातार देखा जाता रहा है। 2014 में भी जब डा. हर्षवर्धन को बिहार जाना पड़ा था, तब भी वह देश के स्वास्थ्य मंत्री थे और 380 बच्चों की मौत हुई थी। आज भी स्वास्थ्य मंत्री को मुजफ्फरपुर जाना पड़ा, क्योंकि रहस्यमयी बुखार, दिमागी बुखार, ‘चमकी’ बुखार बच्चों की जिंदगियां लील रहा है। स्वास्थ्य मंत्री यह बहाना तो बनाते रहे कि उन्होंने मंत्री पद का कार्यभार 15 दिन पहले ही लिया है, लेकिन देश को यह भरोसा नहीं दिला पाए कि बीते पांच सालों के दौरान सरकारों और व्यवस्था ने कौन-सा ठोस काम किया है। पांच सालों के दौरान मोदी सरकार ही थी। बेशक डा. हर्षवर्धन से स्वास्थ्य मंत्रालय ले लिया गया, लेकिन वह कैबिनेट के सदस्य तो थे। बहरहाल बिहार में बुखार से 126 बच्चों की मौत हो चुकी है और लू के गरम थपेड़ों ने जिनकी सांसों पर विराम लगा दिया है, उनकी कुल संख्या 170 बताई जा रही है। ये आंकड़े सिर्फ शनिवार और रविवार के हैं। आंकड़े कम-ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन यह एक भयावह त्रासदी है। ऐसा महसूस हो रहा है मानो बिहार सरकार को इन मौतों से कोई सरोकार नहीं है। गरीब कीड़े-मकौड़ों की तरह मरते रहे हैं, तो अब क्या हुआ? यह बिहार के ‘सुशासन बाबू’ की सरकार का भी विद्रूप सच है, जिनके एक मंत्री बच्चों की इन मौतों को एक ‘प्राकृतिक आपदा’ करार दे रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दौरा किया है, तो बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे भी दिखाई दिए हैं और अफसर भी सक्रिय दिख रहे हैं। इधर बिहार के अस्पतालों में कुपोषित और गरीब बच्चे आखिरी सांसें ले रहे थे और मंत्री जी विदेश में ठंडक लिए घूम रहे थे। गर्मी की छुट्टियां बेकार क्यों की जाएं। मंत्री जी लौटे, तो सीधा दिल्ली की सत्ता के महापर्व में चेहरा दिखाने चले गए। इसे कहते हैं-सुशासन की संवेदनशीलता। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का मन अब भी वातानुकूलित कक्षों से निकल कर झुलसते, तपते और गंदे अस्पतालों तक जाने का नहीं किया है। कितने संवेदनशील हैं मुख्यमंत्री? मौत का मुआवजा मात्र चार लाख रुपए नहीं आंका जा सकता। औसतन हर घंटे एक मां की गोद सूनी हुई है, एक पिता का सपना चूर-चूर हुआ है, किसी के घर का चिराग या सूरज अस्त हो गया है, देश का भविष्य भी खो गया है। बुनियादी समस्या मौत नहीं है। बुनियादी समस्या और सवाल यह है कि यह ‘मौत का बुखार’ क्या है? सरकार उसका निदान क्यों नहीं ढूंढ सकी, पेशेवर डाक्टर और वैज्ञानिक उसे चिन्हित क्यों नहीं कर पाए? उन्होंने मौतों को ‘नियति’ मान लिया और रोजमर्रा के काम करते रहे? किसी की दलील थी कि खाली पेट बच्चों ने कच्ची लीची खा ली, नतीजतन उसके विषाणु प्रभाव से मौतें हुईं। यदि यह निष्कर्ष सामने था, तो बच्चों को लीची क्यों खाने दी गई? प्रचंड गर्मी देश के अन्य हिस्सों में भी पड़ रही है, लेकिन वहां ‘मौत के जानलेवा बुखार’ क्यों नहीं हैं? बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे तर्क दे रहे हैं कि सरकार ने तमाम बंदोबस्त किए हैं, हम मेहनत कर रहे हैं, लोगों को जागरूक कर रहे हैं, यदि हमने इतना भी नहीं किया होता, तो मौत का आंकड़ा न जाने कितना होता। दरअसल यह व्यवस्था और सरकार के स्तर पर घोर लापरवाही का सच है। स्वास्थ्य सेवाएं हमारी प्राथमिकता में कभी भी नहीं रहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर मात्र 1112 रुपए सालाना खर्च किए जाते हैं। यानी तीन रुपए प्रतिदिन… कितना शर्मनाक है। चीन हमसे ज्यादा आबादी वाला देश है, लेकिन वहां प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च औसतन 426 डालर है। दशकों से यह मांग रही है कि जीडीपी का कमोबेश पांच फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाए, लेकिन सच यह है कि मात्र 1.4 फीसदी हिस्सा ही खर्च किया जा रहा है। स्वास्थ्य के लिहाज से विश्व में भारत का स्थान 145वां है, तो फिर ‘मौत के बुखार’ क्या आश्चर्य हो सकते हैं?

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