यह दोगलापन कबूल नहीं

यह आईसीसी के हिस्से का अन्याय और दोगलापन है। बेशक वह क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय संस्था है, लिहाजा उसे विशेषाधिकार प्राप्त हैं, लेकिन किसी खिलाड़ी और उसके राष्ट्र के ‘सम्मान’ से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं है। आईसीसी नियम के उल्लंघन के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को दंडित किया जा सकता है या टीम को चेतावनी भी दी जा सकती है, लेकिन  नियम तो सामूहिक होते हैं। उन्हें समानधर्मा माना जाता रहा है। आखिर आईसीसी ने यह आदेश किस आधार पर पारित किया कि टीम इंडिया के विकेटकीपर के तौर पर धोनी को दस्ताने बदलने पड़ेंगे। वह इसलिए, क्योंकि दस्तानों पर हमारी सेना का एक विशेष प्रतीक चिह्न ‘बलिदान’ अंकित है। पैराशूट के विशेष बल और कमांडो इसका इस्तेमाल करते रहे हैं। हमें राष्ट्र के स्वाभिमान और सेना के सम्मान से खिलवाड़ कबूल नहीं है। धोनी 2011 से टेरिटोरियल आर्मी के मानद लेफ्टिनेंट कर्नल हैं। यह गौरव और अलंकरण उन्होंने अपनी मेहनत और काबिलियत से अर्जित किया है। वह ‘बलिदान’ चिह्न को धारण करने के हकदार हैं। यह चिह्न न तो धार्मिक आधार पर विभेद करता है, न ही इसके नस्लीय संकेत हैं और न सियासी मायने हैं, तो फिर आईसीसी ने इस पर रोक क्यों लगाई है? धोनी अपना सैन्य सम्मान और गौरव धारण क्यों नहीं कर सकते? चूंकि यह मुद्दा पाकिस्तान के विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री चौधरी फवाद हुसैन ने उठाया था। उन्होंने ही पुलवामा में सैनिकों की शहादत के बाद धोनी द्वारा अपनी टीम को बांटी गई सीआरपीएफ की टोपियों का भी विरोध किया था। वह टीम इंडिया के खिलाडि़यों की देशभक्ति थी और अपने ‘शहीदों’ के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि थी। उस पर पाकिस्तान क्यों मिनमिनाने लगा था। अब सवाल यह भी है कि पाकिस्तान को जो ‘मिर्ची’ लगती है, उसका संज्ञान आईसीसी कैसे ले सकती है? यदि यह प्रतीक चिह्न इतना आपत्तिजनक था, तो खेल के दौरान किसी अंपायर या दक्षिण अफ्रीका की टीम (पहले मैच की प्रतिद्वंद्वी टीम) ने आपत्ति दर्ज क्यों नहीं कराई या विवाद क्यों नहीं हुआ? आईसीसी के नियम ये भी हैं कि प्रायोजक दो कंपनियों से ज्यादा के चिह्न इस्तेमाल न किए जाएं। धोनी ने जो धारण किया था, वह किसी व्यापारिक प्रचार की ओर भी संकेत नहीं करता था। गौरतलब तो यह है कि 1992 में जब पाकिस्तान ने क्रिकेट का विश्व कप जीता था, तो इमरान खान (मौजूदा वजीर-ए-आजम) की टीम ने वहीं ग्राउंड में सजदा किया था। मोहाली में पाकिस्तान की तत्कालीन टीम ने नमाज अता की थी, जावेद मियांदाद ने सजदा किया था, मुहम्मद यूसुफ ने शतक बनाने के बाद मैदान में ही सजदा किया था। पाकिस्तान के हिस्से ऐसे कई मजहबी उदाहरण हैं, जो उसकी टीम ने दुनियाभर के क्रिकेट मैदानों पर पेश किए हैं। सवाल है कि खेल के मैदान पर पाकिस्तान को यह मजहबी छूट क्यों है? क्या यह नियमों का उल्लंघन नहीं है? यदि है, तो पाकिस्तान की टीम को कभी इससे रोका क्यों नहीं गया? इसके अलावा, फवाद हुसैन को यह टिप्पणी करने की भी छूट नहीं दी जा सकती कि भारतीय मीडिया युद्ध का उन्माद फैलाने में लगा रहता है, लिहाजा उसे सीरिया, अफगानिस्तान, रवांडा चले जाना चाहिए। धोनी के लिए यह नसीहत भी नहीं चाहिए कि वह क्रिकेट खेलने इंग्लैंड गए हैं, महाभारत के लिए नहीं। धोनी ऐसे विरले बल्लेबाजों में एक हैं, जिन्होंने अपने करियर में 10,000 से ज्यादा रन बनाए हैं और विकेटकीपर के तौर पर कई कीर्तिमान उनके नाम हैं। धोनी कोई नौसीखिया या बचकाना खिलाड़ी नहीं है। अब संभावना यही है कि धोनी को अपने दस्ताने बदलने पड़ें, लेकिन बीसीसीआई को आईसीसी के सामने अपना पुरजोर विरोध दर्ज जरूर कराना चाहिए। आईसीसी क्रिकेट की दुनिया के सबसे कमाऊ और समृद्ध बोर्ड की अनदेखी नहीं कर सकता। सबसे ऊपर राष्ट्रीय सम्मान है, जिसके साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

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