योग विज्ञान की गंभीरता को समझें

सतपाल

सीनियर रिसर्च फेलो, अर्थशास्त्र विभाग, एचपीयू

हमने पूरे देश में बड़े-बड़े योग संस्थान व विश्वविद्यालय तो खोल दिए, परंतु प्रारंभिक स्तर पर कोई भी संस्थान नहीं खुल पाया है। हिमाचल प्रदेश में तो कोई भी संस्थान ऐसा नहीं है, जहां योग शिक्षा होती हो। एक अपवाद केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का है, जहां पर योग विज्ञान में उच्च अध्ययन होता है। प्रदेश विश्व विद्यालय में योग विज्ञान विषय में डिप्लोमा कोर्स के अलावा स्नातकोतर व शोध कार्य भी करवाया जाता है…

आज जब इनसान अनेक बीमारियों, शारीरिक व मानसिक विकारों का शिकार हो रहा है, तो ऐसे में योग शिक्षा का महत्त्व और ज्यादा बढ़ जाता है। योग एक साधना है, जिसको आत्मसात करना होता है, न कि दिखावा व छल और यह एक ऐसी साधना है, जो बिना किसी गुरु के कर पाना असंभव है। इसके लिए एक उचित समय व स्थान की भी उतनी ही जरूरत है, जितनी कि विज्ञान के लिए प्रयोगशाला की।  योग विज्ञान के वैश्वीकरण से जहां आज एक ओर सारा विश्व इस पद्धति का लोहा मान रहा है, वहीं दूसरी ओर हम इसकी शुद्धता को भी खोते जा रहे हैं। आज योग करने का कोई समय नहीं रहा है, दिन के 12 बज रहे हों या रात के 12, जब मन किया फोटोग्राफ में छाए रहने के लिए योग करना शुरू कर देते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि हम लोग योग विज्ञान के केवल एक ही पहलू, जो शरीर को तोड़ने व मरोड़ने से संबंधित है, उसको ही समझ पाए हैं। उसके अंदर छिपा हुआ पवित्रता का जो ज्ञान है, वह योग शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। योग विज्ञान पद्धति भारतीय समाज की अनूठी विशेषता रही है। योग से मनुष्य न केवल शारीरिक व मानसिक विकारों से मुक्ति पा सकता है, अपितु एक अनुशासनात्मक जीवन जीने में भी सफलता प्राप्त करता है।

प्रदेश में योग विज्ञान के संदर्भ में अगर बात की जाए, तो तस्वीर कुछ धुंधली प्रतीत होती है। कुछ वर्ष पूर्व योग शिक्षा को प्रदेश के स्कूली स्तर पर लागू करने की बातें सामने आईं, परंतु वास्तव में ये तुगलकी फरमान सिद्ध हुए। कल 21 जून का दिन पूरे विश्व के साथ प्रदेशभर में पूर्ण हर्ष व उल्लास से मनाया जाएगा। सारे सरकारी संस्थान विश्व योग दिवस के लिए कमर कसते हैं तथा अनेक रिकार्ड राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कायम करते हैं। प्रदेश में निजी स्तर पर योग विज्ञान के छोटे-छोटे केंद्र चल रहे हैं, जिनका पंजीकरण पतंजलि योग संस्थान हरिद्वार से है या अन्य किसी संस्थान से। ये छोटे-छोटे संस्थान अपनी योग्यतानुसार योग क्रियाओं में समाज के लोगों को स्वस्थ व सशक्त बनाने में लगे हुए हैं। स्कूल-कालेजों में सरकार की तरफ से विश्व योग दिवस के लिए फरमान जारी किए जाते हैं, परंतु योग ऐसा विज्ञान है, जिसको बिना किसी योग प्रशिक्षक के कर पाना संभव नहीं है। इसलिए सरकार के आदेशों की पालना व खानापूर्ति के लिए योग दिवस के दिन व्यर्थ में फोटोग्राफी करके हमारी हजारों वर्षों पुरानी धरोहर का मजाक उड़ाया जाता है। इतिहास के पन्नों को अगर गौर से देखें, तो देश-प्रदेश के जितने भी विद्वान हुए हैं या वर्तमान में हैं, तो उनका योग विज्ञान से गहरा नाता रहा है। इस तरह अपनी धरोहर को बिना किसी ठोस तैयारी के हर जगह प्रदर्शित करना कितना न्यायसंगत है। 21 जून की अगर ऐतिहासिक महत्ता की बात करें, तो इस दिन हमारे ब्रह्मांड का उत्तरी गोलार्ध ग्रीष्मकालीन संक्रांति के लिए जाना जाता है। इस दिन उत्तरी गोलार्ध पर धरती अपने अक्ष पर घूमते हुए 23.44 डिग्री सूर्य की तरफ झुक जाती है, जिसके चलते वर्ष का सबसे बड़ा दिन देखने को मिलता है। आधुनिक समय में इस दिन की विश्वभर में महत्ता बढ़ने में उस समय चार चांद लगे, जब वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। योग, भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष पुरानी शैली है। हालांकि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं। जहां लोग शरीर को मोड़ते, खींचते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं। यह वास्तव में केवल मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमता का खुलासा करने वाले इस गहन विज्ञान के सबसे सतही पहलू हैं। अर्थात एक साधारण मनुष्य योग के केवल इसी पक्ष के बारे में जानता है, जबकि योग का अर्थ इन सब से कहीं विशाल है। योग विज्ञान एक निरोग्य शरीर, शांत एवं स्वस्थ मन व चित तथा सर्वोपरि स्वतंत्र आत्मा से जीने की एक जीवनशैली व पद्धति है, जिसकी महत्ता का सम्यक ज्ञान व बोध होना आज के समय में प्रत्येक मनुष्य के लिए अति आवश्यक है। योग का एक पक्ष हमारे लिए कभी भी अनजाना नहीं रहा है। हम सब बचपन से किसी न किसी रूप में कर रहे हैं। चाहे यह बिल्ली खिंचाव आसन हो, जो रीढ़ को मजबूत बनाता है या दूसरे छोटे-मोटे शारीरिक क्रियाकलाप, सब योग का ही अंग हैं। हमारे समाज में योग के प्रति हर व्यक्ति का अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है, परंतु वास्तव में योग हमारे जीवन को एक उचित दिशा देने में मदद करता है। योग की सुंदरताओं में से एक यह भी है कि बूढ़े या युवा, स्वस्थ या कमजोर सभी के लिए यह लाभप्रद है। यदि योग को सही रूप से किया जाए, तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक बनावट के अलावा अंदरूनी सूक्ष्मता के लिए भी कारगर सिद्ध होता है।

इसके लिए योग शिक्षा का प्रसार होना अति आवश्यक है। प्रदेश सहित पूरे देश में योग शिक्षा प्रारंभिक स्तर से उच्च स्तर तक होनी चाहिए, परंतु हमारे यहां तस्वीर बिलकुल विपरीत है। हमने पूरे देश में बड़े-बड़े योग संस्थान व विश्वविद्यालय तो खोल दिए, परंतु प्रारंभिक स्तर पर कोई भी संस्थान नहीं खुल पाया है। हिमाचल प्रदेश में तो कोई भी संस्थान ऐसा नहीं है, जहां योग शिक्षा होती हो। एक अपवाद केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का है, जहां पर योग विज्ञान में उच्च अध्ययन होता है। प्रदेश विश्व विद्यालय में योग विज्ञान विषय में डिप्लोमा कोर्स के अलावा स्नातकोत्तर व शोध कार्य भी करवाया जाता है, परंतु जब निचले स्तर पर योग शिक्षा को शुरू नहीं किया जा रहा है, तो इसका कोई औचित्य बाकी नहीं बचता है। सरकारी क्षेत्र से ज्यादा विकास अगर योग विज्ञान का हुआ है, तो निजी क्षेत्र में हुआ है। आज चाहे होटल हों या कोई अन्य निजी संस्थान, योग को पर्यटकों के लिए एक ब्रांड के रूप में पेश कर रहे हैं। अतः समय आ गया है कि आज हम पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही अपनी धरोहर की शुद्धता को गंभीरता से समझें तथा इसको फलने-फूलने में सहयोग दें। एक दिन योग दिवस के रूप में मनाने से इतना  होगा कि योग के सिर्फ शरीर के तोड़-मरोड़ वाले पहलू को लोग समझ पाएंगे और फिर अगले वर्ष योग दिवस तक सुप्त अवस्था में चले जाएंगे, जो काफी नहीं है। जरूरत है तो योग को ऐसा बनाने की जिससे प्रत्येक व्यक्ति हर दिन की शुरुआत योग दिवस के रूप में करके स्वस्थ नागरिक बनकर स्वस्थ देश-प्रदेश बनाने में सहयोग करें।

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