लाल गाल पर्यटन

खबरें पर्यटकों से मालामाल और दृश्यावलियों को लूटते विकास के बीच, आर्थिक पत्थरबाजी के दौर से गुजरने की शाबाशियां। हम मान सकते हैं कि दो करोड़ पर्यटक यहां आ गए, लेकिन शांति को कुंद करती भीड़ के सामने हिमाचल के अफसाने बदल गए। पर्यटक सीजन को ट्रैफिक जाम में पसीने से तर-ब-तर होना आ गया, क्या मालूम हिमाचल आने की यही रगड़ ठंडक दे जाए या पहाड़ का मौसम ईमानदार व्यवहार करते हुए सुकून से भर दे। ऐसा असंभव होने लगा है और ताक में बैठा सूरज अचानक शिमला को भी गर्म कर देता है। बदल गया राजधानी का मिजाज और वाहनों की चीखोपुकार के बीच पर्यटक सीजन, मात्र सामान बन गया। क्या हमारे लिए पर्यटन एक उत्पाद की तरह है या पर्यटक की मजबूरी का कोई पर्दा जिसे हम सहमति से फाड़ रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पर्यटन की आड़ में चलते काफिलों के साथ, विद्रूपता तथा अपराध की संगत भी मौज मस्ती करने लगी। कम से कम नशे की सूचनाएं तो हिमाचल की छवि को हलाल करने जैसी हैं और कुछ इसी तरह सेक्स रैकेट के दरवाजों से झांकती तस्वीर, देवभूमि की संस्कृति को अभिशप्त कर रही है। जो भी हो पर्यटन का यह रूप, आमद और आमदनी का घिनौना स्वरूप है और इसे सीमांकित करना होगा, ताकि किसी तरह उच्छृंख्लता पांव न फैलाने पाए। मकलोडगंज, कुल्लू या मंडी की सड़कों पर सैलानियों के स्वागत की निगाहें क्यों बदलीं या मारपीट की ऐसी घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि पर्यटक सीजन भी गुस्से से लाल है। ऐसे सैलानी क्यों खुले छोड़ दिए जाएं जो वास्तव में संस्कृति के विरुद्ध मनोरंजन की ख्वाहिश रखते हैं। सूचनाएं शिकारी देवी, बीड़-बिलिंग और काजा तक गूंजते पर्यटन उद्घोष में ऐसी अनुगूंज पैदा कर रही हैं, जिसे कबूल नहीं किया जा सकता। पर्यटन का भटकना या भटके हुए लोगों को पर्यटक मान लेना, किसी भी सूरत में उपयोगी नहीं है। कम से कम उस उल्लास के लिए तो कतई ठीक नहीं, जो पारिवारिक माहौल में हिमाचल को देखना चाहता है। पर्यटन कभी भी भौंडेपन में स्वीकार नहीं होगा, लिहाजा हमें हर सीजन को प्रश्नांकित होने से बचाना होगा। जाहिर तौर पर परिवहन के पहिए लगातार घूम रहे हैं और इसके साथ आती बहारों को हम केवल ग्राहक मान रहे हैं। क्या बीस साल पहले का मनाली आज के पर्यटक को सुकून दे सकता है या परवाणू-शिमला मार्ग पर लंबे जाम गिन कर हिमाचल अपना नाम कमा रहा है। आश्चर्य यह कि पर्यटन की नीति में हिमाचल की अपनी पैरवी भी ‘पर्यटन राज्य’ होने की प्राथमिकता से बचती है। कम से कम पर्यटकों की तादाद में दो करोड़ की शुमारी के लिहाज से, अधोसंरचना विकास के तर्क तो केंद्र तक पहुंचें। एक आशा बंधी थी कि सड़क परियोजनाओं की प्राथमिकता में प्रदेश का परिवहन सैलानियों को सुकून दे पाएगा, लेकिन यह भी क्षणिक सियासी मनोरंजन की तरह मुकर रहा है। केंद्र से हमारे तर्क भी असमंजस से भरे हैं। बतौर पर्यटन राज्य हिमाचल का सबसे बड़ा प्रश्न कनेक्टिविटी है। सड़क, रेल और विमान सेवाओं के माध्यम से हिमाचल को अगर पर्यटक राज्य घोषित होना है, तो यही प्राथमिकता तो यहां के जीवन से जुड़ती है। पर्यावरण संरक्षण, जल संसाधन, बड़े बांध, बर्फबारी, बरसात, लोक संस्कृति तथा मंदिरों की विरासत में घूमते आईनों की पहचान ही तो पर्यटन है। ऐसे में ‘मंदिर रेल परियोजना’ के तहत ऊना से आती ट्रेन को ज्वालामुखी, बिलासपुर, कांगड़ा और मंडी की ओर जोड़ा जाए, तो सड़कों पर भागती भीड़ कम हो जाएगी। एक साथ दर्जनों रज्जु मार्गों और एरियल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क खड़ा करके हिमाचल कई नई डेस्टीनेशन स्थापित कर सकता है। हर दिन हिमाचल कितने पर्यटक आएं और इन्हें किस तरह सुव्यवस्थित ढंग से विभिन्न क्षेत्रों में भेजा जाए, सोचना होगा। पर्यटक पंजीकरण की लाजिमी व्यवस्था अगर प्रवेश द्वारों पर शुरू की जाए, तो वहीं से मार्गदर्शन किसी ऐप के जरिए संभव है। मुख्य पर्यटक स्थलों से दस से बीस किलोमीटर पहले ही वाहनों की पार्किंग करते हुए आगे सार्वजनिक परिवहन, रज्जु मार्ग तथा एलिवेटिड परिवहन से निश्चित रूप से व्यवस्थागत सुधार होगा।

 

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