लावारिस पशुओं की समस्या

— डा. इंदिरा कुमारी, पुराना मटौर

पशु एक खूंटे से बंधा रहता है और चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, तब उसे अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता। ऐसे में यह अपनी शक्ति के बलबूते स्वयं आवारा बन सकता है, परंतु उसमें इतनी बुद्धि कहां। यह आवारा बनाने का श्रेय मनुष्य को देना चाहता है। लावारिस पशुओं की तादाद इतनी बढ़ चुकी है कि ये फसलों के नुकसान से लेकर दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। सरकार ने गोशालाएं तो बनाईं, परंतु गोशालाओं में हो रही समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया।  सबसे पहले तो लोगों को अपने पशु इस तरह लावारिस नहीं बनाने चाहिएं। सरकार को ग्राम पंचायतों की सहायता से चार या पांच गांव को इकट्ठा कर  वहां आरक्षित बाड़ों का निर्माण करना चाहिए और यह बाड़े पशु विभाग के अंतर्गत कर देने चाहिएं। ऐसे बाड़ों का निर्माण ऐसी जगहों पर करना चाहिए, जहां छोटे नाले-झरने बहते हों, ताकि पशुओं के पीने के पानी की समस्या न हो। पशुओं की देखरेख के लिए उचित वेतनमान पर लोगों की नियुक्तियां की जानी चाहिएं। उचित समय पर टीकाकरण और सही तरीके से पालन कर दुधारू पशुओं से सरकार को भी लाभ होगा। यह तभी संभव है जब सरकार और समाज दोनों अपनी भागीदारी ईमानदारी व निष्ठा से तय करेंगे।

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