वर्तमान सामाजिक दर्पण

– देव गुलेरिया, योल कैंप

आज भागदौड़ भरी जिंदगी में पैसा ही एकमात्र ध्येय बन चुका है। चंद सिक्कों के लिए हमने अपराध की राह का चुनाव कर लिया है। क्या हमारी अंतरआत्मा, अंतःकरण, संस्कारों का इतना हनन हो चुका है, जो आज हम सही और गलत का चुनाव नहीं कर पा रहे हैं? अलीगढ़ में बच्ची के साथ इस तरह का जघन्य अपराध इनसानियत पर अमिट काला धब्बा है। आखिर क्यों हमारी न्याय व्यवस्था अपराधियों को उचित और समय पर सजा देने में असमर्थ है? समाज और प्रशासन को इस ओर उचित कदम उठाने चाहिएं, वरना ऐसा न हो कि आने वाले समय में इनसान ही इनसान को पहचानने में असमर्थ हो जाए।

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