विकास की जरूरतों में झगड़ा

हिमाचल सरकार की डेढ़ साल की गणना में अब राजनीतिक इच्छाशक्ति का तकाजा घूरने लगा है और अगर योजना-परियोजनाओं को नजदीक से देखें, तो तस्वीर का बांकापन अभी अपने फ्रेम ही तय नहीं कर पाया। बेशक पूर्व कांग्रेस काल की गड़बडि़यों के जिक्र बड़े और जांच चौड़ी होती जा रही है। छात्रवृत्ति घोटाले से लेकर कंडक्टर भर्ती तक की छानबीन का बुरादा उड़ रहा है और अब तो चिंतपूर्णी और धर्मशाला बस स्टैंड निर्माण के समझौता पत्रों का लबादा हटने लगा है। जांच के निष्कर्षों की सियाही बेशक बेहद काली और वित्तीय अनियमितताओं का लेखा-जोखा भयावह हो सकता है, लेकिन इस घालमेल ने आम नागरिक से उसकी आशाओं की घड़ी छीन ली। विजिलेंस तक पहुंचे बस अड्डों के निर्माण का मामला ठीक उसी तरह का है, जिस तरह पिछली सरकार ने क्रिकेट स्टेडियम के हिसाब से आरोपों की फेहरिस्त को जांच में बुना था। परिणामों की शून्यता में जांच के दायरों का हिसाब प्रायः जनता को नहीं मिलता, फिर भी सरकारों की अदलाबदली से जरूरतें और प्रगति का हिसाब बदल जाता है। मसलन डेढ़ साल से अगर किसी प्रस्तावित बस स्टैंड के निर्माण में एक भी ईंट न लगे तो समय की इस विडंबना की खानापूरी कैसे होगी। हिमाचल में सरकारों के रवैये से योजनाओं की निरंतरता व विकास के लक्ष्य खारिज हो रहे हैं। पिछले करीब पांच साल या इससे भी पहले के जिक्र में अगर घोषणाओं को बेनकाब करके देखें, तो चिन्हित इरादों का भंवर सामने आएगा। यानी एक की तालियों को दूसरी सरकार के आने पर सजा मिलती है या सत्ता की चांदनी में कायदे-कानून ही अपना प्रभाव छोड़ देते हैं। कुछ परियोजनाओं के प्रस्ताव आज भी लावारिस बनकर ठहर गए हैं, लेकिन राजनीतिक रोशनी में इनका सवेरा दिखाया जाता है। कितने ही सुरंग मार्ग हमारी आशाओं के बीचोंबीच अदृश्य पहेली बने हुए हैं, लेकिन राजनीति का घात-प्रतिघात बिना कुछ किए विजेता है। इसलिए महत्त्वाकांक्षी नेशनल हाई-वे तथा फोरलेन परियोजनाओं की लंबी फेहरिस्त मोदी सरकार की बख्शीश बनकर लगातार दो चुनाव जीत गई और अब विकास के मील पत्थर पीछे हट रहे हैं। अब फिर से विचार होगा कि पहाड़ पर फोरलेन बनाने का जुर्म कितना घातक है, जबकि वर्षों तक ढोल नगाड़े पीटे गए। हमारे विकास का मकसद ही अब चुनावी हो चुका है, लिहाजा राजनीति की दूरबीन बदल गई। खासतौर पर हिमाचल में विकास या तो सत्ता के स्वरूप में बंटता है या मंत्रियों के सियासी विभाग को दिखाता है। वर्तमान पर्यटन सीजन में सैलानियों की आमद को सफल माने या पर्यटकों  के सामने पस्त विकास के ढांचे को सलाम करें। हमारे विकास की रूपरेखा पर एनजीटी अगर एक नजर न हो, तो भविष्य के दर्पण को देखना असंभव है। अंततः हिमाचल की प्रगति को जरूरतों में समझना होगा। एक, दो या अनेक बस स्टैंड या विकास की हर रेखा में सुराख इसलिए हैं, क्योंकि राजनीति अपनी सत्ता के दम पर व्यापार करने लगी है। परियोजनाएं अब इसी लाभ के दृष्टिगत मापी जाती हैं, जबकि जरूरतें केवल कहावत या घोषणा बनकर रह जाती हैं। धर्मशाला या चिंतपूर्णी के बस स्टैंड को मात्र घपला बनाकर तो छोड़ा नहीं जा सकता। खासतौर पर वर्षों से विकास को चीख रहा धर्मशाला बस स्टैंड अगर डेढ़ साल से केवल जांच के जूते खा रहा है, तो उपभोक्ता का क्या कसूर, जिसे हर दिन वहां फैली सड़ांध से मुकाबला करना पड़ता है।

 

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