विकास दर बढ़ाने की चुनौती

Jun 3rd, 2019 12:06 am

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

 

चूंकि मोदी-2 सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को तेजी देने की है, जिसकी चाल पिछले कुछ महीनों से सुस्त सी पड़ गई है। इसलिए मोदी-2 सरकार को आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए नई रणनीति बनानी  होगी। नई रणनीति के तहत आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाना होगा। वैश्विक कारोबार में वृद्धि करनी होगी। टैक्स के प्रति मित्रवत कानून को नई राह देनी होगी। ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक सुनिश्चित करनी होगी…

हाल ही में 31 मई को केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी किए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही जनवरी से मार्च में जीडीपी पिछले पांच वर्षों के निचले स्तर पर आ गया। इस तिमाही में जीडीपी का आंकड़ा महज 5.8 प्रतिशत रह गया। निवेश में कमी, विनिर्माण क्षेत्र की सुस्त वृद्धि और कृषि क्षेत्र में कमजोरी से पूरे वित्त वर्ष के लिए जीडीपी 6.8 प्रतिशत रह गई। वित्त वर्ष 2018-19 में जीडीपी सरकार के पहले अग्रिम अनुमान 7.2 प्रतिशत से काफी कम रही। इसी तरह, दूसरे अग्रिम अनुमान में जीडीपी सात प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई थी। आर्थिक वृद्धि दर सुस्त पड़ने के साथ ही भारत का सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा फिसलकर अब चीन के पास चला गया है। सरकार ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) खंड में पैदा हुए संकट को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। कहा गया है कि एनबीएफसी संकट जैसे अस्थायी कारकों की वजह से उपभोग पर असर पड़ा, जिससे चौथी तिमाही में विकास दर सुस्त पड़ गई।

निश्चित रूप से देश की घटी हुई विकास दर बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ना होगा। चूंकि मोदी-2 सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को तेजी देने की है, जिसकी चाल पिछले कुछ महीनों से सुस्त सी पड़ गई है। इसलिए मोदी-2 सरकार को आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए नई रणनीति बनानी  होगी। नई रणनीति के तहत आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाना होगा। वैश्विक कारोबार में वृद्धि करनी होगी। टैक्स के प्रति मित्रवत कानून को नई राह देनी होगी। ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक सुनिश्चित करनी होगी। निर्यात में सुधार और विनिर्माण को आगे बढ़ाने की रणनीति बनानी होगी। भूमि एवं श्रम सुधार और डिजिटलीकरण जैसे नीतिगत प्रयासों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण, बुनियादी ढांचा विकास, आवास एवं स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं को गतिशील करना होगा। इसके लिए मोदी-2 सरकार को अधिक संसाधन भी जुटाने होंगे। इस दिशा में एक ओर विनिवेश की राह पकड़ी जा सकती है, तो दूसरी ओर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की परिसंपत्तियों को भी भुनाया जा सकता है।

निश्चित रूप से उद्योग-कारोबार को गतिशील करने के लिए मोदी-2 सरकार को उपभोग और क्रय शक्ति बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ना होगा। बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक और वित्तीय नीतियों में निरंतरता जरूरी होगी। ऐसे में ऋण बाजार के दबाव को दूर करना मोदी-2 सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एजेंडे में शामिल किया जाना होगा। मोदी-2 सरकार द्वारा भारतीय उपभोक्ताओं की खपत की आकांक्षाओं और वित्तीय बचतों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति अपनानी होगी। आरबीआई की दरों में कटौती करने और अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि इससे आर्थिक चक्र को पटरी पर लाया जा सकेगा। रोजगार भी नई सरकार के लिए निश्चित रूप से एक चुनौती होगी। वैश्विक सुस्ती के बीच रोजगार बढ़ाना नई सरकार की एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में सरकार द्वारा तात्कालिक और दीर्घकालिक कदम सुनिश्चित करने होंगे। इसके लिए जहां मनरेगा जैसी योजनाएं प्रभावी होंगी, वहीं स्वरोजगार तथा उद्यमिता के लिए मुद्रा योजना को और गतिशील करना होगा। सरकारी क्षेत्र में रिक्त पदों की पूर्ति के लिए  शीघ्रतापूर्वक कदम उठाने होंगे। साथ ही कौशल प्रशिक्षण को भी ऊंचाइयां देनी होंगी। चूंकि देश की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मुश्किलों का सामना कर रहा है और किसानों की खराब हालत भी स्पष्ट दिखाई देती है, इसलिए सरकार को कृषि तथा किसानों के कल्याण के लिए नए रणनीतिक कदम उठाने होंगे। जरूरी होगा कि सरकार निजी क्षेत्र को कृषि के साथ जोड़ने की रणनीति बनाए। साथ ही खाद्य प्रसंस्करण का दायरा भी बढ़ाया जाना होगा। चूंकि मोदी सरकार ने कई अहम सुधार किए हैं, उन्हें तेजी से आगे बढ़ाया जा सकेगा। अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में पेट्रोलियम उत्पादों को लाना जरूरी दिखाई दे रहा है। जीएसटी के तहत चार की जगह तीन स्लैब किया जाना उपयुक्त होगा। उल्लेखनीय है कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल)  की कीमतें भी मोदी-2 सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।

अमरीकी प्रतिबंध कड़ा करने से वैश्विक तेल बाजार का संतुलन गड़बड़ा गया है। आपूर्ति घटने की वजह से कच्चे तेल की कीमतें 7 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। चूंकि कच्चे तेल संकट से भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। अतएव मोदी-2 सरकार को तेल की आपूर्ति के लिए बाजार और नए विकल्प तलाशने होंगे। इसी तरह सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती अमरीका और चीन के बीच गहराते ट्रेड वार के बीच अमरीका द्वारा भारत पर भी आयात शुल्क बढ़ाए जाने की आशंका से संबंधित है। 31 मई को ट्रंप प्रशासन ने कहा कि अमरीका भारत से आयात होने वाले सामान पर आयात शुल्क की उपयुक्त छूट चाहता है अन्यथा वह भारत को दी गई प्राथमिकताओं की सामान्यीकरण प्रणाली (जीएसपी) दर्जा समाप्त कर देगा।

चूंकि भारत से सबसे अधिक निर्यात अमरीका को होता है, अतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपने अच्छे संबंधों का उपयोग करते हुए एक अच्छा समाधान निकाला जाना होगा। चाहे ये विभिन्न आर्थिक चुनौतियां चिंताएं पैदा करते हुए दिखाई दे रही हैं, लेकिन देश और दुनिया के अर्थविशषज्ञों का मत है कि मोदी-2 सरकार के लिए आर्थिक चुनौतियों का सामना करना कुछ आसान इसलिए होगा, क्योंकि ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद सरकार में समयानुकूल और साहसिक फैसले लेने की बहुत गुंजाइश है। हम आशा करें कि ऐतिहासिक जनादेश से चुनी गई मोदी-2 सरकार नई आर्थिक चुनौतियों का रणनीतिपूर्वक मुकाबला करेगी और देश को विकास तथा खुशहाली की डगर पर आगे बढ़ाने में कामयाब होगी।

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