विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे…

यहां ब्रह्मरूप सद्गुरुदेव की वंदना की जा रही है। ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मरूप हो जाता है, इस शास्त्रवचन के अनुसार सद्गुरु और ब्रह्मतत्त्व में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक ही हैं। इस वंदना द्वारा ग्रंथकार ने अपने सद्गुरु के नाम की ओर भी संकेत किया है।

सर्ववेदांतसिद्धांतगोचरं तमगोचरम्।

गोबिंदं परमानंदं सदगुरुं  प्रणतोऽस्म्यहम्।

अज्ञेय होकर भी जो संपूर्ण वेदांत(उपनिषद)के सिद्धांत वाक्यों से जाने जाते हैं अर्थात जिन्हें वेदवाक्यों से ही जाना जा सकता है उन परमानंद स्वरूप सद्गुरुदेव श्रीगोबिंद को मैं प्रणाम

करता हूं।

ब्रह्मनिष्ठा का माहात्म्य

जंतूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता तस्मद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम।

आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थिति र्मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते।।

जीव को पहले तो नरजन्म ही दुर्लभ है, उसमें भी पुरुष होना और फिर ब्राह्मण के यहां जन्म लेने पर भी वैदिक धर्म का अनुगामी होना और उसमें भी विद्वत्ता का होना कठिन है। आत्मा और अनात्मा का विवेक,सम्यक अनुभव, ब्रह्मात्मभाव में स्थित और मुक्ति ये सब तो करोड़ों जन्मों में किए गए शुभ कर्मों के बिना प्राप्त हो ही नहीं सकते।

दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम।

मनुष्यत्वं मुमुक्षत्वं महापुरुषसंश्रयः।।

भगवतकृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, ऐसे मनुष्यत्व, मुमुक्षुत्व और महापुरुषों का संग ये तीनों ही अत्यंत दुर्लभ हैं।

लब्ध्वा कथंचिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्। 

यःस्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढ़धीःस ह्यात्महा स्वं विनिहत्यसद्ग्रहात।।

किसी प्रकार जन्म-जन्मांतरों के पुण्यों के फलस्वरूप इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर यदि श्रुति के सिद्धांत का ज्ञान होने के बाद भी मूढ़बुद्धि अपने आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता, तो वह निश्चय ही स्वयं को हनन करने वाला है, आत्मा का अपमान करने वाला है, वह असत में आस्था रखने के कारण स्वयं को ही नष्ट करता है।

इतः को न्वस्ति मूढ़ात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति।

दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम।।

दुर्लभ मनुष्य देह और उसमें भी पुरुषत्व को पाकर जो स्वार्थ साधना में ( जीवन के परमस्वार्थ अर्थात आत्मानुभूति के संदर्भ में) प्रमाद करता है, उससे अधिक मूर्ख भला और कौन होगा?

वदुंत शास्त्राणि यजंतु देवान

कुर्वंतु कर्माणि भजंतु देवताः।

आत्मैक्यबोधेन विना विमुक्ति

र्न सिध्यति ब्रह्मशतांतरेऽपि।।

भले ही कोई शास्त्रों का व्याख्यान करे, देवताओं का यजन करे, अनेक शुभ कर्म करे अथवा देवताओं को भजे, फिर भी जब तक ब्रह्म और आत्मा की एकता का बोध नहीं होता, तब तक सौ ब्रह्माओं की आयु के बीत जाने पर भी उसकी मुक्ति नहीं हो सकती।

अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेत्येव हि श्रुतिः

ब्रवीति कर्मणो मुक्तेरहेतुत्वं स्फुटं यतः।।

क्योंकि धन से अमृतत्व की आशा नहीं है, यह श्रुति मुक्ति का हेतु कर्म नहीं है, यह बात स्पष्ट बतलाती हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो?

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