विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे…

साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः।

येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिद्धयति।।

यहां मनस्वियों ने जिज्ञासा के चार साधन बताए हैं , उनके होने से ही सत्यस्वरूप आत्मा में स्थिति हो सकती है, उनके बिना नहीं।

आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः परिगण्यते।

इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनंतरम्

शमादिषट्कसंपत्तिर्मुमुक्षुत्वमिति स्फुटम्।।

पहला साधन है नित्यानित्य वस्तु, विवेक, दूसरा है लौकिक एवं पारलौकिक सुख भोग में वैराग्य होना, तीसरा है शम,दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान ये छह संपत्तियां और चौथा साधन है

मुमुक्षता अर्थात मोक्ष की उत्कट इच्छा।

ब्रह्म सत्यं जगंमिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहतः।।

ब्रह्मा सत्य (नित्य) है और जगत मिथ्या (अनित्य)है,ऐसा निश्चय ही नित्यानित्यवस्तु विवेक कहलाता है।

तद्वैराग्यं जुगुप्सा या दर्शनश्रवणादिभिः।

देहादिब्रह्मपर्यंते ह्यनित्ये भोगवस्तुनिः।।

दर्शन और श्रवणादि के द्वारा देह से लेकर ब्रह्मलोकपर्यंत संपूर्ण अनित्य भोग्य पदार्थों में जो वैराग्य (रसरहित) बुद्धि है वह वैराग्य है।

विरज्य विषयव्राताद्दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहः। 

स्वलक्ष्ये नियतावस्था मनसः शम उच्यते।।

बार-बार दोष दृष्टि के विचार से उन विषयों से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य में स्थिर हो जाना ही शम  है।

विषयेभ्यंः परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके।

उभयेषामिंद्रियाणां स दमः परिकीर्तितः।

बाह्यानालंबंनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा।।

कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय दोनों को उनके विषयों से खींचकर अपने-अपने गोलकों में स्थिति करना दम है। वृत्ति का बाह्य विषयों का आश्रय न लेना ही उत्तम उपरति है।

सहनं सर्वदुःखानाप्रतीकारपूर्वकम।

चिंताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते।।

चिंता और शोक से रहित होकर बिना किसी प्रकार का प्रतिकार किए सब प्रकार के कष्टों को सहन करने को तितिक्षा कहा गया है।

शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य सत्यबुद्ध्यवधारणम्। 

सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तुपलभ्यते।।

शास्त्र और गुरु वाक्यों में सत्य की वृद्धि करने को सज्जनों ने श्रद्धा कहा है, जिससे (इसी से)वस्तु परमतत्व की प्राप्ति (अनुभव) होती है।

सर्वदा स्थापनं बुद्धेःशुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा।

तत्समाधानमित्यंक्तं न तु चित्तस्य लालनम्।

अपनी बुद्धि को सब प्रकार से शुद्ध ब्रह्म में ही सदा स्थिर रखने को समाधान कहा गया है। अतः चित्त की इच्छा पूर्ति का नाम समाधान नहीं है।

अहंकाररदिदेहांतांबंधानज्ञानकल्पितान्।

स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता।।                       

अहंकार से लेकर देहपर्यंत जितने अज्ञान कल्पित बंधन हैं, उन्हें अपने स्वरूप के ज्ञान द्वारा त्यागने की इच्छा ही मुमुक्षुता है।              

 

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