विश्वकर्मा पुराण

नारदजी के इस प्रकार के वचनों से जिन्होंने धर्म को धारण किया है, उन सब ऋषियों ने इसके बाद तमाम वनस्पति तथा औषधियों के बीज लेकर तथा प्रलयकाल के जल से बची हुई सब प्रजा को साथ में लेकर इलाचल की ओर चल दिए। तथा अपने पीछे आ रहे प्रलयकाल के जल के वेग को न गिनते हुए नारदजी के साथ में जाने लगे। इस तरह अति वेग से आ रहे जल से घबराए हुए उन सबको देखकर जब वह जल उनके बिलकुल नजदीक आ पहुंचा, उस समय नारदजी ने उन सबको क्षण भर में ही इलाचल के ऊपर पहुंचा दिया…

ऋषियों के ऐसे वचन सुनकर नारदजी बोले, हे ऋषियो! अब सब प्रजा को साथ में लेकर यहां से इलाचल की ओर प्रस्थान करना चाहिए। प्रलयकाल के पवन से प्रणित समुद्र का जल देखते-देखते सारी पृथ्वी को अपने में समा लेगा और उस समय पृथ्वी के ऊपर कोई भी जीव, मनुष्य, वृक्ष या औषधि उस प्रलयकाल के जल के द्वारा विनाश में से न उबर सकेगी। नारायण यहां तपस्या कर रहे हैं, उस बद्रिकाश्रम की भूमि तथा विराट प्रभु श्रीविश्वकर्मा की चरण रज जहां पड़ी हुई हो, उस इलाचल पर्वत के सिवाय सारी पृथ्वी जल में समा जाएगी। उस इलाचल के ऊपर अपनी हर प्रकार से रक्षा हो सकेगी। इस समय इलाचल के ऊपर प्रभु के स्थान की रक्षा करने के लिए शेषनारायण अपनों की अंशा से ब्राह्मण का स्वरूप धारण करके रह रहे हैं। वह वात्सायन इस वक्त विराट प्रभु श्रीविश्वकर्मा की लीलाओं का वर्णन रूप महापुराण सुन रहे हैं। हम सब प्राणियों के साथ वहां जाकर भगवान विश्वकर्मा की लीलाओं का श्रवण करते हुए अति दुस्तर ऐसे इस प्रलयकाल को व्यतीत हुआ जानेंगे। नारदजी के इस प्रकार के वचनों से जिन्होंने धर्म को धारण किया है, उन सब ऋषियों ने इसके बाद तमाम वनस्पति तथा औषधियों के बीज लेकर तथा प्रलयकाल के जल से बची हुई सब प्रजा को साथ में लेकर इलाचल की ओर चल दिए तथा अपने पीछे आ रहे प्रलयकाल के जल के वेग को न गिनते हुए नारदजी के साथ में जाने लगे। इस तरह अति वेग से आ रहे जल से घबराए हुए उन सबको देखकर जब वह जल उनके बिलकुल नजदीक आ पहुंचा, उस समय नारदजी ने उन सबको क्षण भर में ही इलाचल के ऊपर पहुंचा दिया। इस प्रकार से महर्षि नारदजी की कृपा से इलाचल को प्राप्त हुई सब प्रजा के सहित उन ऋषियों ने विश्वकुंड में स्नान किया तथा अपने कर्मों से निर्मित हुए उन ऋषियों ने मन से ही श्रीविश्वकर्मा का ध्यान करके समस्त संसार की रक्षा के लिए तथा प्रलयकाल से प्रजा को उबारने के लिए और प्रजा को फिर से सुख संपत्ति प्राप्त करने के अर्थ से प्रभु की स्तुति की। मैंने तुमसे जो पहले कहा, उस प्रकार से प्रभु श्री विश्वकर्मा की स्तुति करके ऋषि बोले, सकल विश्व को धारण करने वाले तथा विश्व के कर्ता ऐसे देवादिदेव प्रभु विश्वकर्मा की जय हो। जय हो! आपके प्रत्येक रोम में लाखों विश्वों का निवास है। समस्त जगत का शासन करने वाले ऐसे निर्गुण अथवा सगुण जैसे हो, ऐसे वह देवादिदेव मुझे सब प्रकार की सुख संपत्ति के देने वाले हो। सूतजी बोले, हे शौनक! इस प्रकार से प्रभु श्रीविराट विश्वकर्मा की सकल विश्व के सुख संपत्ति के लिए प्रार्थना करके वह सब ऋषि इलाचल के पास आए हुए प्रभु विश्वकर्मा के अत्यंत प्रिय ऐसे चंपक वन में गए, यहां चंपक वन में शेषनारायण अपनी एकमात्र कला से ब्राह्मण स्वरूप धारण करके अपनी पुत्री इला तथा उसके पति इलाचल जो कि भगवान को अधिक प्रिय थे, उनका रक्षण करने के लिए विराजे हुए थे। उनके सामने एक आसन पर भगवान की लीलाओं का श्रवण करने को उत्सुक ऐसे वात्सायन विराजे हुए थे। सारी प्रजा तथा  ऋषियों के साथ में आ रहे महर्षि नारद को देखते ही वात्सायन के सहित शेषनारायण अपने आसन से खड़े हुए नारदजी के सामने जाकर उन्होंने उन सबका स्वागत किया। इसके बाद सबको योग्य आसन आदि देकर सम्मान किया है। ऐसे उन ऋषियों सहित प्रजा के मन को शांति देने के हेतु से सारे विश्व के कर्ता, धर्ता और हर्ता ऐसे पुराण पुरुष विश्वकर्मा की लीलाओं का सबको श्रवण कराने के लिए शेषनारायण की अनेक लीलाओं का जिसमें वर्णन है।           

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