विष्णु पुराण

तस्मादहर्निश विष्णु संस्मरणपुरुषो मुने।

न याति नरकं मन्यः सक्षीणाखिलापातकः।

मनः प्रीतिकारः स्वर्गों नरकस्तद्विपर्ययः।

परकस्वर्गसंज्ञे वै पापपुण्ये द्विजोत्तम्।

वस्त्वेकमेक दुःखायेसुखायेप्य नियामच।

कोपाय च ययस्तस्माद्वस्तु वत्स्णात्म कुतः।

तदेव प्रीयते भूतवा युर्दुखाय च जाय ते।

तस्माद्दुःखात्मक मास्ति न च किञ्चित्सुखात्मकम्।

मनसः परिणामोऽमं सुखदुःखादिलक्षणः।

ज्ञानमेव परं ब्रह्म ज्ञान बंधाय चेष्यते।

ज्ञानात्मकमिदं विश्वं न ज्ञानद्विद्यते परम।

विद्याविद्येति मैत्रेय ज्ञानमेवोपधान्य।

एवमेतंमयाख्यात भयतो मंडलं भुवः।

पातालानि च सर्वाणि तथैव नारका द्विज।

समुद्राः पर्वताश्चैव वर्षाणि निम्नगा।

संक्षेपात्सर्वयाख्यात कि भूयः श्रोतुमिच्छमि।

इसीलिए भगवान विष्णु के दिन-रात स्मरण से मनुष्य के सभी पापों का क्षय हो जाता है और उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती। स्वर्ग मन को प्रिय लगता है और नरक उसके विपरीत है। हे विप्र श्रेष्ठ! पाप ही नरक और पुण्य स्वर्ग है। जब एक ही वस्तु से सुख-दुख, ईर्ष्या, क्रोध आदि की प्राप्त होती है, तब वह वस्तु नित्य स्वभाव वाली कहां हुई? क्योंकि एक वस्तु ही कभी प्रिय लगने वाली होती है और वही वस्तु कभी दुःख देने वाली हो जाती है, वह कभी क्रोध और कभी प्रसन्नता प्रदान करती है, इसलिए कोई भी पदार्थ दुःखमय अथवा सुखमय नहीं है। इन सुख, दुखों को तो केवल मन का ही विकास समझो। ज्ञान ही परब्रह्म है, परंतु अविद्या की उपाधि से वही बंधनकारी हो जाता है, यह संपूर्ण जगत ज्ञानमय है, ज्ञान से विभिन्न कोई भी पदार्थ नहीं है, इसलिए हे मैत्रेयजी, तुम्हें भी विद्या और अविद्या दोनों का ज्ञान ही समझना चाहिए। हे द्विज! इस प्रकार समस्त पृथ्वी मंडल संपूर्ण पाताल लोक और सभी नरकों का वर्णन मैंने तुमसे कह दिया है। समुद्र पर्वत, द्वीप, वर्ष, और नदियों की भी संक्षिप्त रूप में व्याख्या कर चुका हूं, अब तुम्हें और क्या सुनने की इच्छा है, सो मुझे बताओ।

कथितं भूतलं ब्रह्ममन्मैतदखिलं त्वया।

भुवर्लोकादिकांल्लो कांछ्रोतिच्छोम्यपं सुने।

तथैव ग्रहसंस्थान प्रमाणनि यथा तथा।

समाचक्ष्व महाभाग तन्मह्यं पविपृच्छते।

रविचंद्रमसोर्यावन्मयखैरवभास्यते।

सममुद्रसरिच्छैला तावतीं पृथिवी स्मृता।

यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार पमिंडलात।

श्री मैत्रेयजी ने कहा, हे ब्रह्मण! आपने समस्त पृथ्वी मंडल के विषय में मुझे बताया। अब मैं भुवलोक आदि सब लोकों का वर्णन सुनना चाहता हूं और उन ग्रहों की जो-जो स्थिति तथा परिणाम है, उन सभी को आप मेरे प्रति कहने की कृपा करिए।  श्री पराशर जी ने कहा, सूर्य और चंद्रमा की किरणों का प्रकाश जितनी दूर तक पहुंचता है, उतनी धरा मंडल को समुद्र नदी और पर्वतादि से युक्त पृथ्वी, कहा जाता है।

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